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'डायबिटीज भी नहीं रोक पाई रास्ता': विश्व नंबर-1 बनने के बाद ज्वेरेव ने साझा किया संघर्ष का सफर, जानिए क्या कहा

Mon, 02 Nov 2026 09:22 PM IST
मयंक त्रिपाठी स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मयंक त्रिपाठी Updated Mon, 02 Nov 2026 09:22 PM IST
सार

अलेक्जेंडर ज्वेरेव चार साल की उम्र में टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित हो गए थे, लेकिन बीमारी उनके टेनिस करियर की राह नहीं रोक सकी। 2026 में दो ग्रैंड स्लैम खिताब जीतकर विश्व नंबर-1 बने ज्वेरेव ने अपनी सफलता का श्रेय मां के सहयोग और हौसले को दिया। उन्होंने कहा कि उनकी उपलब्धि डायबिटीज से जूझ रहे बच्चों और परिवारों के लिए प्रेरणा है।

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Alexander Zverev Opens Up on Type 1 Diabetes Journey After Becoming World No. 1
अलेक्जेंडर ज्वेरेव - फोटो : @rolandgarros

विस्तार

जर्मनी के स्टार टेनिस खिलाड़ी अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने अपने करियर में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए विश्व नंबर-1 का स्थान हासिल कर लिया है। साल 2026 में शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्होंने यह मुकाम हासिल किया। ज्वेरेव टेनिस इतिहास में विश्व नंबर-1 बनने वाले 30वें खिलाड़ी बन गए हैं। इस उपलब्धि के साथ उन्होंने यह भी साबित किया कि टाइप-1 डायबिटीज जैसी बीमारी भी उनके सपनों के रास्ते में बाधा नहीं बन सकी।
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खास रहा यह साल
ज्वेरेव के लिए साल 2026 बेहद खास रहा। उन्होंने इस साल अपने करियर के पहले दो ग्रैंड स्लैम खिताब जीते। इनमें फ्रेंच ओपन (रोलां गैरोस) और यूएस ओपन शामिल हैं। इन उपलब्धियों के दम पर वह विश्व रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचे और साल का अंत भी नंबर-1 खिलाड़ी के रूप में करेंगे।

29 साल और छह महीने की उम्र में विश्व नंबर-1 बनने वाले ज्वेरेव इस उपलब्धि को हासिल करने वाले दूसरे सबसे उम्रदराज खिलाड़ी हैं। उनसे पहले जॉन न्यूकॉम्ब ने 1974 में 30 साल की उम्र में पहली बार यह स्थान हासिल किया था। ज्वेरेव ओलंपिक चैंपियन, दो बार एटीपी फाइनल्स विजेता और 26 टूर-लेवल खिताब जीतने वाले खिलाड़ी भी हैं।
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चार साल की उम्र में हुई थी टाइप-1 डायबिटीज
  • ज्वेरेव ने एटीपी की वेबसाइट पर लिखे अपने एक लेख में विश्व नंबर-1 बनने तक के सफर और टाइप-1 डायबिटीज से अपने संघर्ष को साझा किया। उन्हें महज चार साल की उम्र में इस बीमारी का पता चला था। उस समय डॉक्टरों ने उनके परिवार को बताया था कि इस बीमारी के साथ पेशेवर खेल करियर बनाना लगभग असंभव होगा। हालांकि, उनकी मां इरीना ने इन आशंकाओं को कभी अपने बेटे के सपनों पर हावी नहीं होने दिया।
  • ज्वेरेव ने बताया कि जब उनके पिता अलेक्जेंडर सीनियर और बड़े भाई मिशा टेनिस टूर्नामेंट के सिलसिले में यात्रा करते थे, तब उनकी मां ही घर पर उनके साथ रहती थीं और उनकी देखभाल करती थीं।
  • उन्होंने लिखा, 'जब मेरा जन्म हुआ, तब मिशा लगभग 10 साल के थे। जब मैं खेलना शुरू करने की उम्र में पहुंचा, तब मेरे पिता उनके साथ जूनियर टूर्नामेंट में जाया करते थे। ऐसे में घर पर ज्यादातर समय मैं और मेरी मां साथ होते थे। हम हर चीज मिलकर करते थे।'
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Alexander Zverev Opens Up on Type 1 Diabetes Journey After Becoming World No. 1
अलेक्जेंडर ज्वेरेव - फोटो : @rolandgarros
मां ने कभी टूटने नहीं दिया हौसला
ज्वेरेव ने बताया कि डायबिटीज का पता चलने के बाद भी उनकी मां ने कभी यह नहीं माना कि बीमारी उनके टेनिस करियर में रुकावट बनेगी। उन्होंने लिखा, 'जब मैं चार साल का था, तब मुझे टाइप-1 डायबिटीज का पता चला। उस समय मेरी मां ने कहा था कि वह अभी भी टेनिस खेल सकेगा और अपने सपनों को पूरा कर सकेगा। मेरे रास्ते में चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, मेरी मां ने कभी उन्हें मुझे रोकने नहीं दिया।'

ज्वेरेव के मुताबिक, इस बीमारी ने उन्हें कम उम्र में ही जिम्मेदार और आत्मनिर्भर बनना सिखा दिया। हालांकि, वह यह नहीं मानते कि डायबिटीज ने उनके टेनिस करियर को बेहतर बनाने में सीधे तौर पर मदद की, लेकिन इससे वह अपनी उम्र के मुकाबले जल्दी परिपक्व जरूर हो गए।

खुद लगाते थे इंजेक्शन, मां डॉक्टरों की बातें सुनने नहीं देती थीं
  • जर्मनी के खिलाड़ी ने अपने शुरुआती स्कूली दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्हें कम उम्र से ही अपनी बीमारी का प्रबंधन करना सीखना पड़ा। खाना खाने के दौरान ब्लड शुगर लेवल की जांच करना और खुद को इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। मैच के दौरान भी वह डायबिटीज को नियंत्रित रखने के लिए इंजेक्शन लेते हैं।
  • उन्होंने बताया कि डॉक्टर जब उनके माता-पिता को यह समझाते थे कि बीमारी के कारण उनके लिए कौन-कौन सी गतिविधियां मुश्किल हो सकती हैं, तब उनकी मां उन्हें कमरे से बाहर भेज देती थीं, ताकि वह ऐसी बातें सुनकर निराश न हों।
  • ज्वेरेव ने कहा, 'मुझे लगता है कि यह माता-पिता के लिए ज्यादा मुश्किल होता है। डॉक्टर के कमरे में जाकर यह सुनना कि आपके बच्चे को जीवनभर डायबिटीज रहेगी और कुछ गतिविधियां उसके लिए सही नहीं होंगी, किसी भी माता-पिता के लिए बड़ा झटका होता है। मेरी मां उन बातचीत के दौरान मुझे कमरे से बाहर भेज देती थीं, क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि मैं ये बातें सुनूं।'
  • उन्होंने आगे कहा कि उनकी मां ने कभी इन बातों को स्वीकार नहीं किया और उनके सपनों को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास किया। यही वजह रही कि उन्हें कभी यह संदेह नहीं हुआ कि वह अपने लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। ज्वेरेव ने यह भी बताया कि 16 साल की उम्र तक उनकी मां ही उनकी टेनिस कोच थीं।

Alexander Zverev Opens Up on Type 1 Diabetes Journey After Becoming World No. 1
अलेक्जेंडर ज्वेरेव - फोटो : @Wimbledon
डायबिटीज से पीड़ित बच्चों की मदद के लिए बनाई फाउंडेशन
ज्वेरेव ने अपनी इस उपलब्धि को सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं माना। उन्होंने बताया कि उन्होंने टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों की मदद के लिए अलेक्जेंडर ज्वेरेव फाउंडेशन की स्थापना की है। उन्होंने कहा कि विश्व नंबर-1 बनना उन तमाम लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो इसी बीमारी से जूझ रहे हैं। ज्वेरेव ने यह भी स्वीकार किया कि जैनिक सिनर की चोट के कारण उन्हें शीर्ष स्थान हासिल करने का मौका मिला। हालांकि, उनका मानना है कि आदर्श स्थिति वह होती, जब सभी खिलाड़ी पूरी तरह फिट होते और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे होते।

ज्वेरेव ने कहा, 'विश्व नंबर-1 बनना उन लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो डायबिटीज जैसी समस्या से जूझ रहे हैं। यह सिर्फ मेरे बारे में नहीं है। मैं सभी को दिखाना चाहता हूं कि इस बीमारी के बावजूद अपने सपनों को हासिल किया जा सकता है।' उन्होंने आगे कहा, 'डायबिटीज के साथ आपको कम उम्र में ही जिम्मेदार बनना पड़ता है और अपना ज्यादा ध्यान रखना होता है, लेकिन इसके बावजूद आप एक खुशहाल और संतुष्ट जीवन जी सकते हैं। मुझे टाइप-1 डायबिटीज के साथ विश्व नंबर-1 बनने पर गर्व है। अगर भविष्य में कोई दूसरा डायबिटीज से पीड़ित खिलाड़ी विश्व नंबर-1 बनता है, तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होगी।'
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