शाम में क्यों श्याम से रुसवाईः आनंदमूर्ति गुरू मां

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Thu, 29 Nov 2012 10:02 AM IST
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ज्ञानी और अज्ञानी में बस इतना ही फर्क होता है। ज्ञानी को अपने भीतर बैठा चैतन्य रूप कृष्‍ण याद है। लेकिन अज्ञानी तो कृष्‍ण जब भौतिक शरीर में मौजूद थे, तब भी उनहें भगवान नहीं मानता था। ज्ञानी को दरकार नहीं कि वह कृष्‍ण तभी पहचाने जब वे भौतिक शरीर में या मूर्ति के रूप में उसके सामने मौजूद हों।

ज्ञानी का ज्ञान देशकालातीत होता है। कृष्‍ण के अनन्त चैतन्य स्वरूप को ज्ञानी पहचानता है, इसलिए हम उसे ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मज्ञानी कहते हैं। हम भौतिक रूप से जन्माष्टी का दिन इसलिए मनाते हैं ‌ताकि हम सभी के लिए वह एक ऐसा साधन बने जिसका उपयोग कर हम अपने अन्तर में बैठे चैतन्यरूप कृष्‍ण की ओर अग्रसर हो सकें।

श्याम अपने ही भीतर है
जब दिन ढलता है, शाम होती है, तो शाम के आने पर क्या आपको अपने में अंतर बैठे श्याम की याद आती है। कहते हैं जीवन की शाम है बुढ़ापा। पर मेरी दृष्टि में हर दिन जो समाप्त होता है वह आपको मृत्यु के और करीब ले जाता है। तो जीवन की शाम में क्यों श्याम से रुसवाई। अपने ही भीतर बैठे चैतन्य रूप श्याम से रूठे हुए क्यों हो।

जब बहुत काले घने बादल छा जाते हैं, तो आकाश सांवला दिखता है। जब भी आप आंख बंद कर अपने भीतर झांकते हो, तो वहां भी आपको अंधकार का सांवलापन ही महसूस होता है। तुम्हारे मन के भीतर जो अज्ञान का अंधेरा जन्मों से भरा पड़ा है, वह भी तो सांवला है। तुम्हारे चहुं ओर अंधेरा छाया हुआ है, मन में भी, बाहर भी। मन के भीतर अज्ञान ही अज्ञान है और इसी अज्ञानता से छायी हुई तुम्हारी बु‌द्ध‌ि इस संसार में भोग, मोह और सुख-दुख के द्वंद्वों की ठोकरें खाती फिरती है।

दुख मात्र ठोकर है
अजीब बात तो देखिए। इतनी ठोकरें खाकर भी तुम जागते हो नहीं। बल्कि हर बार जब ठोकर लगती है, तो तुम पर ऐसी बेहोशी छा जाती है। जैसे कोई लोरी गाकर तुम्हें सुला रहा हो। संसार की ठोकर रूपी उस हर लोरी को सुनकर तुम्हारी अज्ञान रूपी नींद और गहरी हो जाती है। भगवान कृष्‍ण को खुद ही गीता में कहना पड़ा था कि 'मम माया दुरत्यया' अर्थात मेरी माया यह माया बड़ी दुस्तर है। कृष्‍ण ने तो संसार रूपी माया के बारे में ऐसा कहा था, लेकिन बहुत से गीता पढ़ने वालों ने माया का अर्थ कृष्‍ण की लीला समझ ली।

आनंदमूर्ति गुरू मां परिचय
इनका जन्म 8 अप्रैल 1966 में हुआ था। उनकी उम्र के दूसरे बच्चे जब नर्सरी राइम पढ़ते थे तब मां वेदान्तों की फिलासिफी पढ़ती थीं। कई शहरों में घूमने के बाद अंत में उन्हें गंगा के किनारे बसे हुए शहर ऋषिकेश को पसंद किया। आनन्दमूर्ति गुरू मां देश के हर कोने में बसे लोगों को अपनी ज्ञान की पावन गंगा से कृतार्थ कर रहीं हैं।

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