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वेदों में भगवान तक पहुंचने का नियमः कृपालु जी महाराज
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
Updated Wed, 20 Feb 2013 12:51 PM IST
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संसार में तीन तत्व हैं। ब्रह्म, जीव और माया। इनमें जीव और माया ब्रह्म के अधीन हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद के पहले अध्यय के आठवें मंत्र में कहा गया है कि संसार जीव, माया और तीसरा ब्रह्म से युक्त है। इसी से संसार का निर्माण हुआ है। हम लोग जीव हैं और यह पृथ्वी, जल, तेज, वायु माया है और भगवान सर्वव्यापक है। इस से संयुक्त होकर यह संसार बना है। इसमें दो नित्य हैं ब्रह्म, जीव और जड़ जगत नश्वर है। माया नश्वर नहीं है। जगत नश्वर है। 'सत्यमनित्यं च'। यह सत्य है पर अनित्य है और ब्रह्म सत्य पर नित्य है। जीव सत्य है और नित्य है, माया भी सत्य है और नित्य है लेकिन जड़ है।
श्वेताश्वतरोपनिषद के पहले अध्याय का नवमां मंत्र कहता है कि, एक वह है जो अज और एक हम भी हैं जो अज हैं। इस बात को सुनकर हम कहेंगे कि हम भगवान से क्या कम हैं। वह भी है अज है और हम भी अज हैं। अज का तात्पर्य है 'अजन्मा' जो बनाया न गया हो। लेकिन वह सर्वज्ञ है और हम अल्पज्ञ। वह ईश है औ हम अनिश हैं। वह शासक है और हम उससे शासित हैं। हम दोनों में यह बड़ा अंतर है।
इस उपनिषद् में कहा गया है कि एक जीव है और एक माया है। इन दोनों पर शासन करने वाला एक भगवान है। ब्रह्म के तीन प्रकार हैं भोक्ता ब्रह्म, भोग्य ब्रह्म और प्रेरक ब्रह्म। भोक्ता ब्रह्म कौन है इसका उत्तर कठोपनिषद् में बताया गया है, भोक्ता ब्रह्म हमलोग हैं। हमारा शरीर रथ, हमारी इन्द्रियां घोड़े हैं, मन रस्सियां और बुद्घि सारथी है हमरी आत्मा इस रथ पर सवार होकर यात्रा करती है।
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करोड़ों वर्षों बाद हमें यह रथ यानी मानव शरीर मिला है। यह इसलिए मिला है ताकि हम इस पर चढ़कर भगवान के पास पहुंच जाएं। भगवान कहते हैं तुम्हें रथ दे दिया है अब तुम मेरे पास आ जाओ। आप कहोगे कि भगवान के पास पहुंचने का मार्ग क्या है। इस विषय का ज्ञान, कानून भगवान ने वेदों में प्रकट किया है। संसार में मौजूद सभी वस्तुओं को भोग्य ब्रह्म कहा गया है क्योंकि भोक्ता यानी हम इनका उपभोग करते हैं। प्रेरक ब्रह्म वह है जो हमें कर्म के लिए प्रेरित करता है।
साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)
कृपालु जी महाराज परिचय
कृपालु जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।
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श्वेताश्वतरोपनिषद के पहले अध्याय का नवमां मंत्र कहता है कि, एक वह है जो अज और एक हम भी हैं जो अज हैं। इस बात को सुनकर हम कहेंगे कि हम भगवान से क्या कम हैं। वह भी है अज है और हम भी अज हैं। अज का तात्पर्य है 'अजन्मा' जो बनाया न गया हो। लेकिन वह सर्वज्ञ है और हम अल्पज्ञ। वह ईश है औ हम अनिश हैं। वह शासक है और हम उससे शासित हैं। हम दोनों में यह बड़ा अंतर है।
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इस उपनिषद् में कहा गया है कि एक जीव है और एक माया है। इन दोनों पर शासन करने वाला एक भगवान है। ब्रह्म के तीन प्रकार हैं भोक्ता ब्रह्म, भोग्य ब्रह्म और प्रेरक ब्रह्म। भोक्ता ब्रह्म कौन है इसका उत्तर कठोपनिषद् में बताया गया है, भोक्ता ब्रह्म हमलोग हैं। हमारा शरीर रथ, हमारी इन्द्रियां घोड़े हैं, मन रस्सियां और बुद्घि सारथी है हमरी आत्मा इस रथ पर सवार होकर यात्रा करती है।
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करोड़ों वर्षों बाद हमें यह रथ यानी मानव शरीर मिला है। यह इसलिए मिला है ताकि हम इस पर चढ़कर भगवान के पास पहुंच जाएं। भगवान कहते हैं तुम्हें रथ दे दिया है अब तुम मेरे पास आ जाओ। आप कहोगे कि भगवान के पास पहुंचने का मार्ग क्या है। इस विषय का ज्ञान, कानून भगवान ने वेदों में प्रकट किया है। संसार में मौजूद सभी वस्तुओं को भोग्य ब्रह्म कहा गया है क्योंकि भोक्ता यानी हम इनका उपभोग करते हैं। प्रेरक ब्रह्म वह है जो हमें कर्म के लिए प्रेरित करता है।
साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)
कृपालु जी महाराज परिचय
कृपालु जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।