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वर्तमान में जीने के लिए भूत को क्षमा करें: श्री श्री रविशंकर

Tue, 16 Jul 2013 12:43 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Tue, 16 Jul 2013 12:43 PM IST
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sri sri ravishankar pravachan live in present

इसी क्षण जाग कर देखो कि आप कौन है। क्या आप अपने आप को अपनी दिखावट के आधार पर, या जो काम आप करते है, उसके आधार पर या लोगों के साथ जो संबंध है उसके आधार पर अपना परिचय देंगे?

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आप अपने शरीर से कहीं ज्यादा हैं, अपने विचारों और भावों से कहीं ज्यादा है। ये सब कुछ बदल रहा है, लेकिन आप वे हैं जो बदल नही रहा है, जो श्वाश्वत है। आप अनंत आत्मा हैं।
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आत्मा की प्रकृति क्या है? आत्मा अनुभव करती है और मूल्यों को बताती है। अनुभव और भावनाओं का मूल्य समझ में तो आता है, लेकिन उन्हें शब्दों में न तो व्यक्त किया जा सकता है और न ही शब्दों में समझा जा सकता है। वे मूल्य जो जीवन शक्ति देते हैं, वे है- आत्मविश्वास, सहयोग, श्रद्घा और ज्ञान।
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ये मूल्य आत्मा से ही प्राप्त होते हैं। हम सोचते हैं कि हम भौतिक पदार्थो में सुविधा प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन हमारे अनुभव में यह भी है कि मात्र भौतिकता ही पूर्ण नही है। प्रसन्नता चेतना का गुण है।

यह भौतिक पदार्थ पर निर्भर तो है, लेकिन यह एक स्थान के बाद समझ पर निर्भर करती है। जैसे ही हम आत्मिक मूल्यों को जीते हैं, जीवन अपनी प्रचूरता को प्राप्त हो जाता है। इनके बिना तो जीवन बहुत ही हल्का है और हम अप्रसन्नता को अनुभव करते हैं।

यह आत्मा का धर्म है कि यह जीवन को थामे रहती है। आध्यात्मिक मूल्यों को जीने से आपका व्यक्तित्व शक्तिशाली होता है। आध्यात्मिक जीवन का समाज पर क्या प्रभाव होता है? यह अपनेपन का भाव, जिम्मेदारी, करुणा और विश्व की देखभाल का भाव लाती है, पूरी मानव जाति के लिये सोच देती है।

आध्यात्मिकता ही सही अर्थों में जाति, वर्ण, धर्म और राष्ट्रीयता की सीमाओं को तोड़ सकती है और हमें बताती है कि जीवन सब जगह व्याप्त है। जब मन विश्राम करता है, तो बुध्दि तीक्ष्ण हो जाती है। जब मन आकांक्षाओं, ज्वर और इच्छाओं से भरा हुआ होता है तो बुद्घि अपनी तीक्ष्णता खो देती है।

और जब बुद्घि तीक्ष्ण नही होती, तो जीवन पूरा अभिव्यक्त नही होता। विचारों का प्रवाह रुक जाता है और योग्यता धीरे धीरे समाप्त होने लगती है। इस समझ के साथ आपको अपने छोटे मन से बाहर निकलना है और यही कदम आपके जीवन की परेशानियों को समाप्त कर सकता है।

आपको अपने लोभ, घृणा, ईर्ष्या और अन्य अपूर्णताओं से मुक्त होने की इच्छा रखनी होगी। जब तक मन इन नकारात्मकताओं में उलझा रहेगा, यह शांत और प्रसन्न नही हो सकता- आप अपने जीवन को प्रसन्नता से जी नही पाएंगे।

तो सबसे पहले आप यह जान लें कि यह सब नकारात्मकता भूतकाल का प्रभाव है और अपने भूतकाल को वर्तमान में प्रभाव डालने से रोकें। भूतकाल को क्षमा कर दें। यदि आप अपने भूतकाल को क्षमा नही कर सकते तो आपका भविष्य दयनीय हो जाएगा। भूतकाल को छोड़कर एक ताजा जीवन जीने का संकल्प लें।

वर्तमान क्षण में पूर्णरुप से रहने के लिये आपको अपनी परेशानियों को संभालने की योग्यता की आवश्यकता होती है। वह क्या है जो आपको परेशान कर रहा है? जो कुछ भी आपकी भावना है, उसमें जकड़े बिना उसे जिएं। बच्चे कभी चिंतित नही होते।

वे किसी भी भावना को अनुभव करते हैं और उसे पूरी तरह अभिव्यक्त करते हैं, और अगले ही क्षण प्रसन्न हो जाते हैं। जो कुछ भावनाएं इस क्षण में

आप में उठ रही है, बस 100 प्रतिशत उसके साथ रहें। उन्हें दिव्यता के साथ बांटे। उन्हें समर्पित कर दें। इसका अभ्यास करें। तब आप चिंतित नही होंगे। आध्यात्मिकता के पथ पर आप के पास प्रचूरता होगी। इसका संतुलन बनाएं - इतना विश्वास रखें कि जो भी आपको मिलेगा उसे आगे देना है, आलसी ना बनें।

आध्यात्मिक जीवन आपको प्रभावशाली बनाता है और शक्तिशाली कर्मों में लगाता है। यह कठोर श्रम से मुक्ति नही बल्कि गंभीर कार्य करने के लिये प्रेरित करता है।
साभारः आर्ट ऑफ लिविंग

श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।


महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।

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