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अद्भुत संत जिनके आगे सब फीकेः ओशो

Thu, 20 Jun 2013 12:31 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Thu, 20 Jun 2013 12:31 PM IST
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osho vani on great sant kabir das

जो एक बार समग्र श्रद्धा और संकल्प और समर्पण से यात्रा शुरू करता है-भटकता नहीं, रास्ता मिल ही जाता है। ऐसे रास्तों पर उतारने वाले का नाम संतपुरुष, सद्गुरु है। कबीर दास ऐसे ही संत और सद्गुरू हैं।

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इनका रास्ता बड़ा सीधा और साफ है। बहुत कम लोगों का रास्ता इतना सीधा-साफ होता है। टेढ़ी-मेढ़ी बातें कबीर को पसंद नहीं। इसलिए उनके रास्ते का नाम है: सहज योग। इतना सरल है कि भोलाभाला बच्चा भी चल जाए। पंडित न चल पाएगा। तथाकथित ज्ञान न चल पाएगा। निर्दोष चित्त होगा, कोरा कागज होगा तो चल पाएगा।
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कबीर के संबंध में पहली बात समझ लेनी जरूरी है। यहां पांडित्य का कोई अर्थ नहीं है। कबीर खुद भी पंडित नहीं हैं। कहा है कबीर ने: ‘मसि कागद छूयौ नहीं, कलम नहीं गही हाथ’-कागज-कलम से उनकी कोई पहचान नहीं है।
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‘लिखालिखी की है नहीं, देखादेखी बात’-कहा है कबीर ने। देखा है, वही कहा है। जो चखा है, वही कहा है। उधार नहीं है। कबीर के वचन अनूठे हैं; जूठे जरा भी नहीं। और कबीर जैसा जगमगाता तारा मुश्किल से मिलता है।

संतों में कबीर के मुकाबले कोई और नहीं। सभी संत प्यारे और सुंदर हैं। सभी संत अदभुत हैं; मगर कबीर अदभुतों में भी अदभुत हैं, बेजोड़ हैं। कबीर की सब से बड़ी अद्वितीयता तो यही है कि जरा भी उधार नहीं है।

अपने ही स्वानुभव से कहा है। इसलिए रास्ता सीधा-साफ है; सुथरा है। और चूंकि कबीर पंडित नहीं हैं, इसलिए सिद्धांतों में उलझने का कोई उपाय भी नहीं था। बड़े-बड़े शब्दों का उपयोग कबीर नहीं करते। छोटे-छोटे शब्द हैं जो सभी की समझ में आ सकें।

लेकिन उन छोटे-छोटे शब्दों से ऐसा मंदिर चुना है कबीर ने, कि ताजमहल फीका है। जो एक बार कबीर के प्रेम में पड़ गया, फिर उसे कोई संत न जंचेगा। और अगर जंचेगा भी तो इसलिए कि कबीर की ही भनक सुनाई पड़ेगी। कबीर को जिसने पहचाना, फिर वह शक्ल भूलेगी नहीं। हजारों संत हुए हैं, लेकिन वे सब ऐसे लगते हैं, जैसे कबीर के प्रतिबिंब। कबीर ऐसे लगते हैं, जैसे मूल।

उन्होंने भी जान कर ही कहा है, औरों ने भी जानकर ही कहा है-लेकिन कबीर के कहने का अंदाजे बयां, कहने का ढंग, कहने की मस्ती बड़ी बेजोड़ है। ऐसा अभय और ऐसा साहस और ऐसा बगावती स्वर, किसी और का नहीं है।

साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन
ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतानों में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये।


ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये।

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