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ज्ञानी नहीं अज्ञानी बनकर महाज्ञानी बनें
अध्यात्मिक गुरू / ओशो
Updated Fri, 15 Nov 2013 07:54 AM IST
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गुरु पूर्वीय चेतना की खोज है। पश्चिम की भाषाओं में ‘गुरु’ जैसे कोई शब्द भी नहीं; शिक्षक है, अध्यापक है, आचार्य है, पर गुरु जैसा कोई शब्द नहीं। पहले तो गुरु शब्द को समझ लें, क्योंकि बड़े सूक्ष्म भाव उसमें समाहित हैं। शिक्षक तो वह है जो ज्ञान दे, जिससे हम कुछ सीख लें, स्मृति बढ़े, जानकारी बढ़े।
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गुरु शिक्षक नहीं है। वह ज्ञान नहीं देता; उससे तुम्हारी जानकारी भी नहीं बढ़ेगी। ठीक उलटा ही है, गुरु शिक्षक से। वह तुम्हारा सारा ज्ञान छीन लेता है। वह तुम्हारी स्मृति को गिरा देने के लिए उपाय बताता है। वह पहले तुम्हें परम अज्ञानी बना देता है; क्योंकि जैसे ही तुम परम अज्ञान की प्रतीति से भर जाओ, वैसे ही परमात्मा के द्वार खुल जाते हैं।
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क्योंकि वह द्वार उसके लिए ही खुलते हैं, जो नहीं जानता है। जो जानता है कि मैं नहीं जानता हूं, बस उसी के लिए वह द्वार खुलते हैं। जिसे खयाल है कि मैं जानता हूं, उसके लिए परमात्मा के द्वार सदा बंद है-परमात्मा के कारण नहीं, उसके जानने की भ्रांति के कारण।
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इससे बड़ा कोई अहंकार नहीं है कि मैं जानता हूं। क्या जानते हैं आप? जो भी जानते हैं, कचरा है। वह कचरा भी अपना नहीं है, वह भी उधार है; वह भी किसी से सीखा है। इस कचरे के बोझ को हम पांडित्य कहते हैं। इस बोझ को हम ढोते रहें, यह पत्थर की तरह हमारी छाती पर बढ़ता जाएगा। लेकिन यह बोझ कभी पंख नहीं बन सकता।
इससे तुम परमात्मा के आकाश में उड़ न सकोगे। इससे मोक्ष का कोई भी संबंध नहीं, क्योंकि मोक्ष के लिए तो निर्भार होना जरूरी है। सब बोझ हट जाए, तो ही पंख उन्मुक्त आकाश में प्रवेश कर सकते हैं। और ज्ञान से बड़ा कोई बोझ नहीं है। तुम जानते हो, वही तुम्हारी मुसीबत है, वही तुम्हारा बंधन है। और अहंकार जल्दी मान लेता है कि है कि मैं जानता हूं, क्योंकि अंहकार को यह मानना कि मैं अज्ञानी हूं, बड़ी पीड़ा से भरी बात है।
इसलिए सुकरात ने कहा है, जब कोई ज्ञानी हो जाता है तो पहली बात तो यही जानता है कि मैं नहीं जानता हूं। तब द्वार खुलते हैं। वह द्वार भी ज्ञान के नहीं, वह द्वार भी अनुभव के है। जब कोई अनुभव कर लेता है कि मैं नहीं जानता हूं, तभी तो शिष्य होने की क्षमता आती है। अगर थोड़ी-सी भी समझ लेकर तुम मेरे पास आए हो, तो तुम नासमझ ही वापस लौट जाओगे।
तुम्हारी समझ ही तो बाधा हो जाएगी। तुम मुझे मौका ही न दोगे कि मैं तुम्हारे भीतर जा सकूं, दरवाजे पर तुम्हारी समझदारी खड़ी है। समझदारी का हटना जरूरी है। तुम जो भी जानते हो, उसका हटना जरूरी है। क्योंकि एक बात तो तय है कि तुम्हारे जानने से न तो तुम्हें सत्य मिला, न तुम्हें जीवन मिला, न तुम्हें प्रकाश मिला।
इस जानने से तुमने पाया क्या है? इस जानने से तुमने सिवाय अहंकार के और कुछ भी नहीं पाया है। इस जानने से यह अकड़ मिली कि मैं जानता हूं। और यह अकड़ बिलकुल थोथी है। और यह अकड़ वैसी है, जैसे रस्सी जल जाए, उसमें अकड़ होती है।
इस अकड़ में कोई शक्ति भी नहीं है। क्योंकि इस जानने से कुछ भी तो जीवन सघन नहीं होता, प्रगाढ़ नहीं होता। यह जाननेवाला बैठ जायेगा, चलेगा नही; क्योंकि वह कहेगा, मुझे पता नहीं, कहां जाऊं; रास्ता कहां; मुझे पता नहीं, मंजिल कहां, मुझे पता नहीं। तो उचित यह है कि बैठ ही जाऊं जब तक पता नहीं है। कम से कम न जानने वाला भटकेगा नहीं।
साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन