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मरने के बाद क्यों, जीते जी भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Fri, 27 Sep 2013 02:36 PM IST
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शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि आत्मा तब तक एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकती रहती है जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती। लेकिन क्या आपके पता है मोक्ष क्या है? मुक्ति क्या है?
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यह प्रश्न हर भारतीय संस्कृति के पक्षधर मानव के मन में सहज ही उठता रहता है, सदा से ही, उसके आविर्भाव के काल से। कई व्यक्ति समझते हैं मोक्ष मरने के बाद, शरीर रूपी बंधन के छूटने के बाद ही मिलता है। इसके लिए वे दान-पुण्यादि अनेकों कार्य करते हैं।
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लेकिन क्या मोक्ष इससे मिल जाता है? ऋषियों की दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी विधा है जिसका अन्तर्चक्षुओं से साक्षात्कार कर समझना होगा। ऋषि-मनीषा कहती हैं कि जो मोह का क्षय करे, वही मोक्ष है। यह सदेह जीवन मुक्त स्थिति किसी को भी प्रयास करने पर मिल सकता है।
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मोक्ष वस्तुतः जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा का नाम है। वासना-तृष्णा-अहंता रूपी त्रिविध बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर आत्मतत्व की ओर अन्मुख होने का पुरूषार्थ ही मोक्ष है। इस मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, किन्तु लक्ष्य सभी का एक है- जीव को बंधनों से मुक्त करना।
वस्तुतः मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरूषार्थ, जिसे निर्वाण मुक्ति या अपवर्ग कुछ भी नाम दे दें, के लिए कर्म कर व परमतत्व की प्राप्ति हेतु इस प्रयोग को सार्थक बनाए। मोक्ष प्राप्ति हेतु किए जाने वाले इस कर्म को यदि जीवन जीने की कला कहा जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी।
गीता में योगेश्वर श्री कृष्ण, इस कला का जिसमें बंधन मुक्ति या मोक्ष प्राप्ति का संदेश दिया गया है, बड़ा ही सुन्दर शिक्षण अर्जुन को देते हैं। मोक्ष को गीताकार जीवन के एक सकारात्मक पक्ष के रूप में लेता है। कर्म करते हुए व उन कर्मों को मन से परम सत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरूषार्थ करता है तो वह मोक्ष इसी जीवन में पा लेता है।
कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेकानेक बंधनों को काटना पड़ता है, जिनमें लोभ प्रधान, मोह प्रधान व अहं प्रधान तीनों प्रमुख हैं। बंधन सदा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं। इनसे छुटकारा पा लेना, ज्ञान द्वारा भव बंधनों से मुक्ति पा लेना ही मोक्ष है।
यदि यह दूरदर्शिता हमारे अंदर आ जाए तो मोक्ष का तत्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरम सीमा तक पहुंचा सकते हैं। यह मार्ग ऋतंभरा प्रज्ञा के आश्रय के रूप में प्रत्येक के लिए खुला है।साभारः जीवन पथ के प्रदीप (डां. प्रणव पण्डया)