भगवान श्री कृष्ण को इसलिए देना पड़ा अर्जुन को गीता का ज्ञान
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धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र दोनों ही शब्द बड़े अच्छे हैं। हम जहां कहीं भी हों, हम सब यहां कुरुक्षेत्र में ही हैं। कुरु माने कर्म। क्षेत्र यानी जहां जहां आप जाते हैं वहां कर्म होता है। आपके कुरुक्षेत्र में भी युद्ध होता है। बड़भागी और भाग्यशाली वो हैं जिनके कुरुक्षेत्र में कौरव पराजित होते हैं और श्रीकृष्ण की करुणा से सद्गुणों का साम्राज्य स्थापित होता है।
पूरी गीता कह पाना और समझना बड़ा कठिन है। अनंत काल तक गीता का स्वाध्याय होता रहेगा। विचारक इसमें से नए-नए मोती प्राप्त करते रहेंगे। धर्म से प्रारंभ होने के बाद गीता का जहां पर्यवसान होता है, वहां एक शर्त है। श्रीमद्भगवद्गीता धर्मक्षेत्र से चलते-चलते पर्यवसान तक शोक को मिटाती है। मनुष्य के जीवन में शोक प्रकट होते हैं, यदि शोक मिटा लेता है तो उसका जीवन सुखमय होता जाता है।
यदि अर्जुन को शोक न आया होता तो शायद श्रीमदभगवद्गीता प्रकट ही नहीं होती। दरअसल श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध के समय एक चिंता जागी। यानी जो सारे संसार को चिंता से मुक्त करने वाला स्वयं चिंतित हो गया। भगवान ने सोचा कि अभी यदि अर्जुन को ज्ञान न दे पाया तो मेरा अस्तित्व विवादास्पद हो जाएगा। लोग कहेंगे कि अर्जुन को ही ठीक नहीं कर पाए तो दुनिया को क्या ठीक कर पाएंगे। इसलिए अपने अस्तित्व को ठीक करने के लिए भगवान ने ज्ञान की गंगा बहाई।
(प्रस्तुति-एम सी शर्मा)