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जानें क्या हुआ उस अंधियारी रात जब कान्हा ने जेल में लिया जन्म

सद्गुरु, ईशा फाउंडेशन Updated Mon, 03 Sep 2018 03:19 PM IST
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श्रावण के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है, इससे पहले की कृष्ण जन्म हो आइये जानते हैं उनके जन्म की पूर्व कथा। कृष्ण का पूरा जीवन जितना दिलचस्प घटनाओं और चमत्कारों से भरा है, उनके जन्म की कहानी भी उतनी ही अद्भुत है -
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वासुदेव और देवकी के यहां पहले बच्चे का जन्म हुआ। सुरक्षाकर्मियों ने कंस इसकी सूचना दे दी। कंस तुरंत वहां आया। कंस को देखकर वासुदेव और देवकी रोने लगे और कहा कि’ तुम्हारा दुश्मन तो हमारा आठवां बच्चा है। इसे तो छोड़ दो,  लेकिन कंस ने कहा कि मैं कोई कसर बाकी नहीं छोडऩा चाहता। उसने बच्चे को उठाया और पैर पकडक़र उसे जमीन में दे मारा।

इससे पहले कि हम कृष्ण की लीला और उनके तौर तरीको को जानें, उनकी शिक्षाओं और गीता के बारे में जानकारी हासिल करें, हमें उनके जीवन की पृष्ठभूमि और उन ऐतिहासिक परिस्थितियों के बारे में जानना चाहिए, जिनमें उन्होंने अपनी जिंदगी गुजारी। जितने भी कम समय के लिए आप मेरे साथ रहे हों, मैंने लगातार आपको इस बात के लिए प्रेरित किया है कि आप हर बात पर संशय करें, हर चीज पर सवाल करें, लेकिन अब आपको इस बात को भूल जाना होगा। अगर आप संशय करते रहे तो आप भक्ति मार्ग और उसके जुनून को नहीं जान पाएंगे। आपको एक भावुक प्रेमी जैसा बनना पड़ेगा। एक ऐसी स्थिति अपने भीतर पैदा करनी होगी कि तार्किक शक्ति कम हो जाए और अंदर रहे तो बस एक पागल दिल। आपको एक बड़े उत्सव की तरह होना पड़ेगा।

एक इंसान की तरह कृष्ण ने अपने जीवन में एक मकसद तय किया था। एक बहुत सक्रीय जीवन जी रहे इंसान की कमियों के साथ साथ उन्में ईश्वरीय तत्व भी मौजूद था। जाहिर है ये सभी बातें एक साथ देखने पर बेहद जटिल मालूम पड़ती हैं। उन्हें महज एक रूप में देखना ठीकनहीं होगा। अगर आप उनके जीवन के महज एक पहलू को ही देखने की कोशिश करेंगे तो कृष्णका एक विस्तृत रूप ही उभरकर सामने आएगा। वह इतने बहुआयामी हैं कि जब तक आप उनके हर पहलू को थोड़ा-थोड़ा नहीं छू लेते, तब तक उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा।

उनके इर्द गिर्द बहुत सी चीजें हुईं। कुछ बहुत ही तर्कसंगत थीं, प्यारी थीं, आनंददायकथीं, तो कुछ बहुत निष्ठुर और ज़रूर थीं और कुछ बेहद चमत्कारिकभी। लेकिन एक चीज जो उनके आसपास नहीं दिखती, वह है नीरसता। पागलपन नजर आता है, प्रेम दिखता है, पराक्रम दिखता है, चालाकी दिखती है, आनंद दिखता है, चमत्कार दिखता है, लेकिन नीरसता नजर नहीं आती। ऐसे में नीरसता को यहां भी मत आने दीजिए।

कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा में हुआ था। आप में से कई लोग मथुरा जा भी चुके होंगे। यादव समाज के सर्वेसर्वा उस वक़्त उग्रसेन हुआ करते थे। समाज में उनका बहुत महत्वपूर्ण स्थान था और उन्हें लोग राजा की तरह सम्मान देते थे। समाज के इस मुखिया को उस वक़्त राजा की बजाय राजान्यास कहा जाता था। उग्रसेन बूढ़े हो रहे थे। उधर उनका बेहद महत्वाकांक्षी बेटा कंस अपने पिता के मरने का इंतजार भी नहीं कर पा रहा था। जब आप राजा हों और आपका बेटा बेहद महत्वाकांक्षी हो तो या तो आपको जल्दी ही मर जाना चाहिए या फिर वनवास पर चले जाना चाहिए। अगर आप इनमें से एक भी काम नहीं करते हैं तो आपके बेटे की महत्वाकांक्षाएं कुंठा का रूप ले लेंगी।

बस कुछ ऐसा ही हुआ उग्रसेन के साथ। कंस उग्रसेन की  कार्यशैली से काफी कुंठित हो गया। उसे लगता कि उसके पिता के काम करने के तरीके पुराने हैं। वैसे ऐसा हमेशा होता है। नई पीढ़ी हमेशा यह सोचती है कि पुरानी पीढ़ी के लोगों की सोच बहुत पुरानी है। खैर, कंसकी महत्वाकांक्षाओं ने उसे इंतजार नहीं करने दिया और जल्द ही एकदिन ऐसा आया, जब उसने अपने पिता को जेल में डाल दिया और खुद राजा बन बैठा। वह पूरब के एक  बेहद क्रूर राजा जरासंध के नञ्चशे कदम पर चलने लगा। दरअसल, पूरी दुनिया को जीतना और उस पर अपना शासन स्थापित करना जरासंध का स्वप्न था। बेहद बर्बर सेना के जरिए उसकी ताकत दिनोंदिन तेज गति से बढ़ती जा रही थी। कंस ने भी उन्हीं तौर तरीकों को अपना लिया, क्योंकि उस वक्त ताकतवर बनने का बस यही रास्ता था।

कंस की बहन देवकी की शादी वासुदेव से हुई, जो यादव समाज के ही एक मुखिया थे। दरअसल, यादवों के बीच उस वक्त कई उप समाज थे। कंस का संबंध वृषनिस उप समाज से था तो वासुदेव शूर से संबंधित थे। दरअसल, यह कहानी थोड़ी उलझी हुई है, जिसमें कहानी के भीतर कहानी है और हर कहानी कुछ कहती है। अगर आप पूरे मामले को ध्यान से नहीं समझेंगे तो कई चीजें ऐसी रह जाएंगी जो आपको समझ नहीं आएंगी। खैर, शूरों के सरदार वासुदेव की कंस की बहन देवकी से शादी हो गई। शादी के बाद कंस अपनी बहन को रथ में बिठाकर विदा करने जा रहा था। तभी आकाशवाणी हुई, 'हे कंस, अपनी जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसका आठवां पुत्र तेरा काल होगा।‘  यह सुनकर कंस आग-बबूला हो उठा। उसने अपनी तलवार निकाली और देवकी का वध करने के लिए झपटा। वासुदेव ने तुरंत उसे रोका और प्रार्थना करने लगे, 'देवकी तुम्हारी बहन है। तुम उसकी जान कैसे ले सकते हो?कृपा करके उसकी जिंदगी बक्श दो।‘कंस बोला – ‘लेकिन देवकी का आठवां पुत्र मेरा अंत कर देगा और मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ भी हो।‘वासुदेव ने कंस के सामने एक प्रस्ताव रखा, 'मैं तुमसे वादा करता हूं कि हमारा जो भी बच्चा होगा, मैं उसे तुम्हारे हवाले कर दूंगा। तुम उसे मार देना। लेकिन अभी मेरी पत्नी की जान न लो।'

कंस ने देवकी को छोड़ तो दिया, लेकिन वह अपने जीवन और सुरक्षा को लेकर इस कदर चिंतित हो उठा कि उसने वासुदेव और देवकी को जेल में डाल दिया, ताकि उन पर कड़ी नजर रखी जा सके। वासुदेव और देवकी के यहां पहले बच्चे का जन्म हुआ। सुरक्षाकर्मियों ने कंस इसकी सूचना दे दी। कंस तुरंत वहां आया। कंस को देखकर वासुदेव और देवकी रोने लगे और कहा कि’ तुम्हारा दुश्मन तो हमारा आठवां बच्चा है। इसे तो छोड़ दो,  लेकिन कंस ने कहा कि मैं कोई कसर बाकी नहीं छोडऩा चाहता। उसने बच्चे को उठाया और पैर पकडक़र उसे जमीन में दे मारा। यह क्रम जारी रहा। जब भी बच्चे का जन्म होता, वासुदेव और देवकीकंस से उसे न मारने की गुजारिश करते, लेकिन कंस ने एक को भी नहीं छोड़ा। इस तरह छह नवजात बच्चों को मार दिया गया।

देवकी और वासुदेव, कंस के तौर तरीकों से बेहद कुंठित हो गए थे। पूरे राज्य में प्रजा भी उससे बेहद डरी हुई थी। धीरे-धीरे दूसरे लोग भी कुंठित होने लगे और महल के अंदर ही फूट और अनबन होने लगी। जब सातवां बच्चा आया तब वासुदेव ने कुछ जुगाड़ करके उसे एक मरे हुए नवजात बालक से बदल दिया और अपने बच्चे को वहां से बाहर निकालने में सफल रहे। वे बोले, 'यह बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ है। बताइए, हम क्या करें?  क्योंकि यह पहले से ही मरा हुआ है, इसीलिए आपको इसे मारने का सौभाग्य नहीं मिलेगा।‘  इस तरह वासुदेव और देवकी के सातवें बच्चे को यमुना पार पहुंचा दिया गया। यमुना नदी के एक ओर मथुरा और दूसरी ओर गोकुल है। इस बच्चे को वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के पास गोकुल पहुंचा दिया गया।

उस वक्त अधिकतर विवाह राजनैतिक संधि के तौर पर होते थे। उस वक्त जो राजा होता था, वह जहां भी राजनैतिक, सैनिक संबंध और शांति लाना चाहता था, वहां की कन्या से विवाह कर लेता था। दरअसल, राजा को पता होता था कि क्योंकि दूसरे दल ने उसे अपनी कन्या दे दी है, इसलिए वह उस पर हमला तो कर नहीं सकता। यह वह वक्त था, जब राजा एक के बाद एक कितने ही विवाह करते रहते थे। यह कूटनीति का हिस्सा होता था।

खैर, वासुदेव और देवकी की जिस सातवीं संतान को रोहिणी के पास पहुंचाया गया था, उसका नाम बलराम रखा गया। बड़े होकर बलराम बहुत बलशाली हुए, उनके बल और वीरता की कई कहानियां मशहूर हुईं।

कृष्ण का अवतरण

उधर वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान आने से पहले कंस बहुत घबरा गया। वासुदेव और देवकी को नजऱबंद करके रखा गया था, लेकिन बाद में वासुदेव को जंजीरों में बांध दिया गया और देवकी को एक कारागार में डाल दिया गया। भाद्र कृष्ण अष्टमी को आधी रात को देवकी के यहां आठवीं संतान ने जन्म लिया। उस वक्त बादल गरज रहे थे और तेज बारिश हो रही थी। कुछ होने के डर से कंस ने किसी को भी कारागार में जाने की अनुमति नहीं दी थी। उसने पूतना नाम की अपनी एक भरोसेमंद राक्षसी को दाई के तौर पर देवकी पर नजर रखने को कहा था। योजना कुछ इस तरह थी कि जैसे ही बच्चे का जन्म होगा, पूतना उसे कंस को सौंप देगी और उसे मार दिया जाएगा। प्रसव पीड़ा शुरू हुई। दर्द होता और कम हो जाता, फिर होता और फिर कम हो जाता। पूतना प्रतीक्षा करती रही, पर कुछ नहीं हुआ। तभी वह अपने घर गई। शौचालय से लौटकर जैसे ही वह वापस कारागार आने के लिए निकली, मूसलाधार बारिश होने लगी। सडक़ों पर पानी भर गया और इस स्थिति में पूतना वापिस कारागार नहीं पहुंच सकी। उसी समय बच्चे के जन्म के साथ एक चमत्कार हुआ। कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। सभी सिपाही सो गए और जंजीरें खुल गईं। शीघ्र ही वासुदेव ने अंतर्ज्ञान से दैवीय शक्ति को पहचान लिया, और बच्चे को लेकर यमुना नदी की ओर चल दिए। हालांकि सब जगह पानी बह रहा था, फिर भी उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि नदी के घाट सट गये और वह सरलता से पार कर गये। वह नदी पार करके नन्द और उनकी पत्नी यशोदा के घर पहुंचे। तभी यशोदा ने एक बच्ची को जन्म दिया था, और वह पीड़ा के कारण बेसुध थीं। वासुदेव ने बच्ची को कृष्ण से बदल दिया, और उसे लेकर वापस जेल में आ गए।

तभी बच्ची रोने लगी। सिपाहियों ने कंस को सूचित कर दिया। तब तक पूतना भी आ चुकी थी। कंस ने जब लडक़ी को देखा तो उसे लगा कि कुछ गलत हुआ है, इसलिए उसने पूतना से पूछा, 'क्या तू बच्ची के जन्म के समय वहीं थी ?’  पूतना डर गई और बोली, 'मैंने अपनी आंखों से देखा है, यह देवकी की ही बच्ची है।'  देवकी और वासुदेव कहने लगे, 'यह बच्ची तुम्हे नहीं मार सकती। यदि यह लडक़ा होता, तभी तुम्हारा काल बनता। इसलिए इस बच्ची को छोड़ दो।'  लेकिन कंस बोला कि वह कोई संभावना नहीं रखना चाहता। उसने तुरंत बच्ची को उठाया, और जैसे ही वह उसे ज़मीन पर पटकने लगा, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश की ओर उड़ गई और हंसकर बोली, 'तुझे मारने वाला तो कहीं और है।'

अब कंस को सच में वहम हो गया। उसने वहां सब से पूछताछ की। सिपाही सो गए थे और पूतना चली गई थी। जाहिर है, कोई भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं था। लेकिन कंस संतुष्ट नहीं हुआ। उस बच्ची की कही गई बात उसे मन ही मन परेशान करती रही। भाद्र का महीना था। उसने भाद्र मास में जन्मे सभी बच्चों को मारने के लिए अपने लोग भेज दिए। शुरू में ये लोग कुछ बच्चों को लेकर आए और उन्हें मार दिया, लेकिन इससे जनता के बीच असंतोष और गुस्सा पनप गया। लोगों ने इसका विरोध किया। कंस को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा। फिर उसने पूतना को बुलाकर कहा, ''सैनिकों द्वारा बच्चों को मारने का विरोध हो रहा है। तुम महिला हो। तुम घर-घर जाओ और भाद्र के महीने में पैदा हुए बच्चों को मार डालो।'  पूतना ने ऐसा करने से मना कर दिया, लेकिन कंस के जोर देने पर उसने हामी भर दी।

पूतना हर घर में जाती और श्रावण मास में पैदा हुए बच्चों को मार देती। इस तरह उसने नौ बच्चों को मार दिया। वह और बच्चों को नहीं मारना चाहती थी। वह कंस के पास गई और बोली, ''काम हो गया है।'  कंस बोला, ''तुम झूठ बोल रही हो। ऐसा कैसे हो सकता है कि भाद्र के महीने में बस नौ ही बच्चे पैदा हुए हों। और भी बच्चे होंगे। जाओ और पता करो।'  पूतना गई और फिर आकर कंस से कहा, ''बस नौ ही बच्चों ने इस महीने जन्म लिया था। मैंने उन सभी को मार डाला है। अब इस महीने पैदा हुआ कोई बच्चा नहीं बचा है।‘

तो इस तरह कृष्ण को पशु पालक  समाज में पहुंचा दिया गया। एक  राजान्यास का बेटा होने के बावजूद उनका लालन पालन एक आम ग्वाले जैसा हुआ। उनके बचपन की कई कहानियां आपने सुनी होंगी। उनकी जिंदगी में तमाम दिलचस्प घटनाएं और चमत्कार हुए।

एक योगी, दिव्यदर्शी, सद्गुरु, एक आधुनिक गुरु हैं। विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहे सद्गुरु के रूपांतरणकारी कार्यक्रमों से दुनिया के करोड़ों लोगों को एक नई दिशा मिली है। 2017 में भारत सरकार ने सद्गुरु को पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

 

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