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शरद पूर्णिमा पर चंद्र दर्शन क्यों है विशेष ? जानिए चंद्रमा की सोलह कलाओं, खीर और इसका ज्योतिषीय महत्व

Thu, 22 Oct 2026 04:20 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 22 Oct 2026 04:20 PM IST
सार

हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा 25 अक्तूबर को है। शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा 16 कलाओं से युक्त होता है और इस दिन खुले आसमान के नीचे खीर रखने की मान्यताएं हैं। 
 

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शरद पूर्णिमा 2026 - फोटो : AI

विस्तार

सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व होता है। आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व चंद्रदेव की उपासना, मां लक्ष्मी की कृपा और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है। मान्यता है कि इस रात्रि में चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी शीतल चांदनी अमृतमयी गुणों से युक्त होती है। शरद पूर्णिमा पर चंद्र दर्शन, चंद्रदेव को अर्घ्य देना और चाँदनी में खीर रखना विशेष फलदायी माना जाता है।
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शरद पूर्णिमा का क्या है धार्मिक महत्व
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रदेव अपनी पूर्ण आभा के साथ पृथ्वी पर शीतलता, आरोग्य, पोषक शक्ति एवं शांति रूपी अमृत की वर्षा करते हैं। 
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  • शरद पूर्णिमा की रात को उज्ज्वल चाँदनी को अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि चंद्रमा की शीतल किरणों के संपर्क में समय बिताने से मन को शांति और सकारात्मकता की अनुभूति होती है। 
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  • इस दिन चंद्रदेव को अर्घ्य देकर सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

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ज्योतिषीय दृष्टि से चंद्रमा का क्या है महत्व
  • ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, भावनाओं, मानसिक शांति, माता और मनुष्य की संवेदनशीलता का कारक माना गया है। 
  • जन्मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति को व्यक्ति के मानसिक स्वभाव और भावनात्मक संतुलन से जोड़कर देखा जाता है। 
  • ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रदेव की पूजा-अर्चना करने, चंद्र मंत्रों का जाप करने और उन्हें दूध मिश्रित जल से अर्घ्य देने से चंद्रमा की अनुकूलता प्राप्त करने की कामना की जाती है।
  • जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर माना जाता है, वे इस दिन विशेष पूजा एवं दान-पुण्य करते हैं। 

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शरद पूर्णिमा पर चांदनी में क्यों रखते हैं खीर
शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में खीर रखने का विशेष विधान है। खीर में मिश्रित दूध, चीनी और चावल को चंद्रमा से संबंधित माना जाता है, इसलिए इस रात्रि में इन पर चंद्र किरणों का विशेष प्रभाव होने की मान्यता है। परंपरा के अनुसार तीन से चार घंटे तक खीर पर चंद्रमा की किरणें पड़ने के बाद इसे अमृत तुल्य मानकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह खीर शरीर को पुष्ट करने, शीतलता प्रदान करने और आरोग्य बनाए रखने में सहायक होती है।

शरद पूर्णिमा पर चंद्र दर्शन का महत्व
शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की शीतल चांदनी में बैठने और प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा की पूर्ण आभा मन को शांति प्रदान करती है और जीवन में प्रेम, अनुराग तथा सकारात्मकता का संचार करती है। इस रात्रि में चंद्रमा की ओर सहज भाव से देखना शुभ माना जाता है। 
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