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सालासर बालाजी धाम जहां हनुमानजी से पहले किया जाता है भक्त को नमन
Tue, 14 Mar 2023 12:21 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 14 Mar 2023 12:21 PM IST
सार
बालाजी की प्रतिमा शालिग्राम पत्थर की है जिसे सिंदूरी रंग और सोने से सजाया गया है। दिन में कई बार इनकी पोशाक बदलकर इनका भव्य श्रृंगार किया जाता है,कभी गुलाब तो कभी मोगरा के फूलों से इनकी झांकी सजाई जाती है।
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राजस्थान के चुरू जिले के सालासर में स्थित जन-जन की आस्था और विश्वास को समेटे सभी हनुमान भक्तों का परम पावन धाम है।
- फोटो : iStock
विस्तार
मन में श्रद्धा, जुबां पर जयकारे, लहराती लाल ध्वजा और गूंजती जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ......................की चौपाईयां। ऐसा ही भव्य, आलौलिक, आध्यात्मिक नजारा देखने को मिलता है सालासर बालाजी के मंदिर का। यह मन्दिर वीर भूमि राजस्थान के चुरू जिले के सालासर में स्थित जन-जन की आस्था और विश्वास को समेटे सभी हनुमान भक्तों का परम पावन धाम है। श्री बालाजी की भव्य प्रतिमा सोने के सिंहासन पर विराजमान है। इसके ऊपरी भाग में श्रीराम दरबार है तथा निचले भाग में श्रीराम के चरणों में दाढ़ी-मूंछ से सुशोभित हनुमानजी श्री बालाजी के रूप में विराजमान है। श्री बालाजी का ऐसा वयस्क रूप यहां के अलावा और कहीं देखने को नहीं मिलता है इसी कारण भक्त इन्हें बड़े हनुमान जी कहकर भी पुकारते हैं।
बालाजी की प्रतिमा शालिग्राम पत्थर की है जिसे सिंदूरी रंग और सोने से सजाया गया है। दिन में कई बार इनकी पोशाक बदलकर इनका भव्य श्रृंगार किया जाता है,कभी गुलाब तो कभी मोगरा के फूलों से इनकी झांकी सजाई जाती है। प्रतिष्ठा के समय से ही मन्दिर के अन्दर अखण्ड दीप प्रज्वलित है। प्रत्येक वर्ष चैत्र पूर्णिमा तथा आश्विन पूर्णिमा के पावन पर्व पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को भक्तों की भारी भीड़ रहती है। मान्यता है कि पूर्णिमा के पावन दिन यहां आने वाले सभी भक्तों की मुरादें पूरी होती है, भक्त यहां स्थित एक अति प्राचीन वृक्ष पर नारियल बांध कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की अभिलाषा करते हैं।
कथा
इस मन्दिर के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार माना जाता है कि बहुत समय पहले राजस्थान के एक गांव असोता में अचानक एक दिन खेती करते हुए एक किसान का हल किसी वस्तु से टकरा गया और वहीं पर रूक गया, जब किसान ने देखा तो उसे वहां एक शिला दिखाई दी और जब उसने उस स्थान पर खुदाई आरंभ की तो वहां से मिट्टी से सनी हनुमान जी की मूर्ति प्राप्त हुई। उस दिन शनिवार का समय था तथा श्रावण शुक्ल की नवमी थी। किसान ने इस घटना के बारे में लोगों को बताया। कहते है कि जब वहां के जमींदार को भी उसी दिन एक सपना आया कि भगवान हनुमान जी उसे आदेश देते हैं कि उन्हें सालासर में स्थापित किया जाए तो उसी रात सालासर के एक निवासी मोहनदास को भी भगवान हनुमान जी ने सपने में दर्शन देकर आदेश दिया कि मुझे असोता से सालासर में ले जाकर स्थापित किया जाए। अगले दिन भक्त मोहन दास जमींदार के पास जाकर अपने सपने के बारे में उन्हें बताते है तो जमींदार भी उसे उसी सपने के आदेश के बारे में बताते हैं। इस पर दोनों ही आश्चर्य चकित रह जाते हैं तथा भगवान के आदेश अनुसार मूर्ति को सालासर में स्थापित कर दिया जाता है। इस मन्दिर में बालाजी के परम भक्त मोहनदास जी की समाधि स्थित है। इस मंदिर की यही मान्यता है कि भक्त इनके दर्शन करने के पश्चात ही बालाजी के दर्शन करते हैं। मोहनदास जी द्वारा प्रज्वलित अग्नि कुंड धूनी आज भी मौजूद है, मान्यता है कि इस अग्नि कुंड की विभूति समस्त दुखों एवं कष्टों को दूर कर देती है।
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बालाजी की प्रतिमा शालिग्राम पत्थर की है जिसे सिंदूरी रंग और सोने से सजाया गया है। दिन में कई बार इनकी पोशाक बदलकर इनका भव्य श्रृंगार किया जाता है,कभी गुलाब तो कभी मोगरा के फूलों से इनकी झांकी सजाई जाती है। प्रतिष्ठा के समय से ही मन्दिर के अन्दर अखण्ड दीप प्रज्वलित है। प्रत्येक वर्ष चैत्र पूर्णिमा तथा आश्विन पूर्णिमा के पावन पर्व पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को भक्तों की भारी भीड़ रहती है। मान्यता है कि पूर्णिमा के पावन दिन यहां आने वाले सभी भक्तों की मुरादें पूरी होती है, भक्त यहां स्थित एक अति प्राचीन वृक्ष पर नारियल बांध कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की अभिलाषा करते हैं।
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कथा
इस मन्दिर के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार माना जाता है कि बहुत समय पहले राजस्थान के एक गांव असोता में अचानक एक दिन खेती करते हुए एक किसान का हल किसी वस्तु से टकरा गया और वहीं पर रूक गया, जब किसान ने देखा तो उसे वहां एक शिला दिखाई दी और जब उसने उस स्थान पर खुदाई आरंभ की तो वहां से मिट्टी से सनी हनुमान जी की मूर्ति प्राप्त हुई। उस दिन शनिवार का समय था तथा श्रावण शुक्ल की नवमी थी। किसान ने इस घटना के बारे में लोगों को बताया। कहते है कि जब वहां के जमींदार को भी उसी दिन एक सपना आया कि भगवान हनुमान जी उसे आदेश देते हैं कि उन्हें सालासर में स्थापित किया जाए तो उसी रात सालासर के एक निवासी मोहनदास को भी भगवान हनुमान जी ने सपने में दर्शन देकर आदेश दिया कि मुझे असोता से सालासर में ले जाकर स्थापित किया जाए। अगले दिन भक्त मोहन दास जमींदार के पास जाकर अपने सपने के बारे में उन्हें बताते है तो जमींदार भी उसे उसी सपने के आदेश के बारे में बताते हैं। इस पर दोनों ही आश्चर्य चकित रह जाते हैं तथा भगवान के आदेश अनुसार मूर्ति को सालासर में स्थापित कर दिया जाता है। इस मन्दिर में बालाजी के परम भक्त मोहनदास जी की समाधि स्थित है। इस मंदिर की यही मान्यता है कि भक्त इनके दर्शन करने के पश्चात ही बालाजी के दर्शन करते हैं। मोहनदास जी द्वारा प्रज्वलित अग्नि कुंड धूनी आज भी मौजूद है, मान्यता है कि इस अग्नि कुंड की विभूति समस्त दुखों एवं कष्टों को दूर कर देती है।
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