Rishi Panchami 2020: कौन हैं सप्त ऋषि, क्यों किया जाता है ऋषि पंचमी का व्रत
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी का व्रत रखा जाता है। आज यानि 23 तारीख को ऋषि पंचमी है अगर आप व्रत न रख पाएं तो क्षमा के लिए पूजा कर सकते हैं। इस दिन किसी देवी-देवता की नहीं बल्कि सप्त ऋषियों की पूजा की जाती है। विष्णु जी के मत्स्य अवतार की कथा में सप्त ऋषियों के बारें में उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार जब धरती धरती पर जल प्रलय आई थी उस समय पूरी पृथ्वी जल में समा गई थी। उस समय सभी सूक्ष्म प्रणियों, बीजों आदि को लेकर सप्तऋषि एक नाव पर सवार हो गए थे, तब श्री हरि विष्णु नें मत्स्य अवतार धारण करके पृथ्वी की रक्षी की थी। कहते हैं कि जलप्रलय में इस नाव में जो बच गए उन्ही से धरती पर दोबारा जीवन चक्र शुरु हुआ।
इस व्रत को करने से जाने-अनजाने हुई भूल और पापकर्मों से मुक्ति मिलती है यह व्रत विशेषतौर पर महिलाएं करती हैं। महावारी के दौरान धार्मिक कार्यों को लेकर हुई गलतियों की क्षमा के लिए यह व्रत किया जाता है। इस व्रत की कथा भी महावारी से जुड़ी हुई है।
सप्त ऋषियों के बारें में कई अलग-अलग जानकारियां मिलती है जिनके आधार पर सप्तऋषियों के नाम इस प्रकार से हैं। सप्त ऋषियों के बारे में इस श्लोक में इस तरह से वर्णन मिलता है।
कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहंतु पापं सर्व गृह्नन्त्वर्ध्यं नमो नमः॥
- ऋषि कश्यप,
- अत्रि ऋषि
- भारद्वाज ऋषि
- विश्वामित्र ऋषि
- गौतम ऋषि
- जमदग्नि ऋषि
- वशिष्ठ ऋषि
इस श्लोक में इन सात ऋषियों के नामों का वर्णन किया गया है।
- ऋषि कश्यप पहला स्थान माना गया है। कथा के अनुसार जब गणेश जी ने अगलासुर का अंत करने के लिए उसे निगल लिया था, तब पेट की जलन को शांत करने के लिए ऋषि कश्यप ने ही दूर्वा की गांठे बनाकर दी थी, जिससे गणेश जी के पेट की जलन शांत हुई थी। इनकी एक पत्नी का नाम अदिति और दूसरी का नाम दिति था। कहते हैं कि अदिति से देवों और दिति से दैत्यों की उत्तपत्ति हुई थी।
- क्रमानुसार दूसरे ऋषि अत्रि हैं। इनकी पत्नी अनुसूया थी। इनके पुत्र का नाम दत्तात्रेय है। कथाओं के अनुसार माना जाता है कि त्रेतायुग में जब श्रीराम को वनवास मिला था, तब सीता जी और अनुज लक्ष्मण के साथ राम अत्रि ऋषि के आ़़श्रम में आकर रूके थे।
- तीसरे स्थान पर ऋषि भारद्वाज आते हैं। इन्होंने महान ग्रंथों की रचना की थी। आयुर्वेद के ग्रंथ की रचना भी इन्होंने ही की थी। कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य इन्हीं के पुत्र थे।
- ऋषि विश्वामित्र चौथे स्थान पर आते हैं। जब राजा जनक ने सीता जी के स्वयंवर का आयोजन किया,तो राम जी और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ ही वहां गए थे। इन्होंने ही गायत्री मंत्र की रचना की ।
- ऋषि गौतम ये पांचवे ऋषि हैं। इनकी पत्नी अहिल्या थी। इन्होंने अपनी पत्नी के पत्थर की हो जाने का श्राप दे दिया था। राम जी के चरण स्पर्श से अहिल्या पुनः सही हो गई थी।
- जमदग्नि को छठे ऋषि का स्थान दिया जाता है। परशुराम इन्हीं के पुत्र थे। जमदग्नि के कहने पर ही परशुराम ने अपनी माता रेणुका का सिर काट दिया था।
- ऋषियों में ऋषि वशिष्ठ को सातवां स्थान दिया जाता है। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न के त्रेता युग में ये गुरू थे।