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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Pitru Paksha 2026 Important Rules to Follow During Pitru Paksha Ancestral Worship Rituals

पितृ पक्ष 2026: श्राद्ध पक्ष में इन नियमों का रखेंगे ध्यान, खूब मिलेगा पितरों का आशीर्वाद

Sat, 26 Sep 2026 06:45 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Sat, 26 Sep 2026 06:45 PM IST
सार

वास्तु में दक्षिण दिशा पितरों की दिशा मानी गई है।पितृपक्ष में पितरों का आगमन दक्षिण दिशा से होता है। इसलिए दक्षिण दिशा में पितरों के निमित्त पूजा,तर्पण किया जाता है।

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Pitru Paksha 2026 Important Rules to Follow During Pitru Paksha Ancestral Worship Rituals
पितृपक्ष 2026 - फोटो : अमर उजाला AI

विस्तार

भारतीय संस्कृति में श्राद्ध का विशेष महत्व है। भाद्रपद माह की पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक का पक्ष 'महालय' श्राद्ध पक्ष कहलाता है। इस पक्ष में व्यक्ति की जिस तिथि को मृत्यु हुई है उस तिथि के दिन उस मृत व्यक्ति के पुत्र-पौत्रदि द्वारा उसका श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्वक किया हुआ वह संस्कार ,जिससे पितृ संतुष्टि प्राप्त करते हैं। शास्त्रीय मान्यता है कि पितृ या पूर्वज ही हमें जीवन में आई विपरीत परिस्थितियों से उबारने में मदद करते हैं। उनका मार्गदर्शन कई बार हमारी अंतरात्मा की आवाज या अचानक मिलने वाली सही समझ के रूप में हम तक पहुंचता है। श्राद्धभोज में पितरों को कई प्रकार के स्वादिष्ट पकवानों का भोग लगाया जाता है। ऐसा करने से पितर संतुष्ट होकर अपने परिजनों को दीर्घायु,आरोग्य,धन-संपत्ति,स्वर्ग प्राप्ति जैसे सभी सुख प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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श्राद्ध से निभता है पितृ ऋण का धर्म
शास्त्र कहते हैं कि 'पुन्नाम नरकात् त्रायते इति पुत्रः अर्थात- जो नरक से त्राण ( रक्षा ) करता है वही पुत्र है। श्राद्ध कर्म के द्वारा ही पुत्र जीवन में पितृ ऋण से मुक्त हो सकता है। जो लोग श्राद्ध कार्य इस शंका से नहीं करते कि 'कौन हैं पितर और कहाँ हैं' इस शंका का समाधान करते हुए मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं कि 'पितृ सूक्ष्म स्वरुप में श्राद्ध तिथि को अपनी संतान के घर के द्वार पर सूर्योदय से ही आकर बैठ जाते हैं,इस उम्मीद में कि उनके पुत्र-पौत्र भोजन से उन्हें तृप्त क़र देंगे।किन्तु सूर्यास्त होने तक भी पितरों को जब भोजन प्राप्त नहीं होता है तो वे निराश व रुष्ट होकर श्राप देते हुए अपने पितृलोक लौट जाते है।इसीलिए शास्त्रों में श्राद्ध करने की अनिवार्यता कही गई है।  
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पितृ पूजन में दक्षिण दिशा 
वास्तु में दक्षिण  दिशा पितरों की दिशा मानी गई है।पितृपक्ष में पितरों का आगमन दक्षिण दिशा से होता है। इसलिए दक्षिण दिशा में पितरों के निमित्त पूजा,तर्पण किया जाता है। श्राद्ध करने में दूध, गंगाजल, मधु, वस्त्र, कुश,तिल अनिवार्य तो है ही, तुलसीदल से भी पिंडदान करने से पितर पूर्णरूप से तृप्त होकर कर्ता को आशीर्वाद देते हैं।
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वास्तु से जुड़ा पूजन कक्ष 
ध्यान रहे की जहां पितरों की पूजा की जा रही है वह स्थान  साफ़-सुथरा हो,उसकी दीवारें हल्के पीले, गुलाबी ,हरे या वैंगनी जैसे आध्यात्मिक रंग की हो तो अच्छा है,क्यों कि ये रंग आध्यात्मिक ऊर्जा के स्तर को बढ़ाते है।काले,नीले और भूरे जैसे तामसिक रंगों का प्रयोग पूजा कक्ष की दीवारों पर नहीं होना चाहिए।

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तर्पण से श्राद्ध भोज तक दिशा का ध्यान 
वास्तु में पितरों का क्षेत्र दक्षिण दिशा माना गया है इसलिए यह ध्यान रहे कि तर्पण करते समय कर्ता का मुख दक्षिण में ही रहे।तर्पण के समय अग्नि को पूजा स्थल के आग्नेय यानि दक्षिण-पूर्व में रखना शुभ होता है क्योंकि यह दिशा अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करती है। इस दिशा में अग्नि संबंधित कार्य करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, रोग एवं क्लेश दूर होते है और घर में सुख-समृद्धि का निवास होता है। श्राद्ध भोज करवाते समय ब्राह्मण को दक्षिण की ओर मुख करके बिठाना चाहिए, ऐसा करने से पितृ संतुष्ट होकर प्रसन्न होते हैं।
  
पितृ कृपा से सुख-समृद्धि 
पितरों की तस्वीर पूजा स्थल से अलग रखना चाहिए। वास्तु के अनुसार, हॉल या बैठक की दक्षिण-पश्चिम या पश्चिम दीवार इसके लिए उचित मानी जाती है। बेडरूम, रसोई, सीढ़ियों, ब्रह्मस्थान और जीवित लोगों की तस्वीर के साथ इसे लगाने से बचें। तस्वीर हमेशा साफ-सुथरी और सम्मानजनक स्थान पर रखें।
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