श्राद्ध पक्ष में पितरों की तृप्ति, मुक्ति और पितृदोष से मुक्ति के लिए पंचबलि कर्म, तर्पण और पिंडदान के लिए शास्त्रों में विशेष समय निर्धारित किया गया है। सही समय पर किया गया श्राद्ध पितरों तक सीधे पहुंचता है और शुभ फल प्रदान करता है। इससे अगली पिछली सभी पीढ़ियों को लाभ मिलता है। इसलिए श्राद्ध कर्म जरूर करना चाहिए।
श्राद्ध पक्ष 2026: पितृ कर्म के लिए कौन सा समय है सबसे शुभ? जानिए 4 खास मुहूर्त
पितृ पक्ष में पितरों की आत्मिक शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व है। शास्त्रों में इन कर्मों के लिए कुछ विशेष काल बताए गए हैं। आइए जानते हैं श्राद्ध कर्म के शुभ समय और मुहूर्त।
श्राद्ध कर्म के लिए मुख्य काल और शुभ मुहूर्त
शास्त्रों (जैसे निर्णय सिंधु और मत्स्य पुराण) के अनुसार श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराने के लिए दिन का विशेष समय तय किया गया है। यदि इन मुहूर्तों के दौरान 'गजछाया योग' बनता है, तो इसे अत्यंत दुर्लभ और अक्षय फलदायी संयोग माना जाता है।
1. कुतुप काल (8वाँ मुहूर्त)
कुतुप काल दिन का 8वाँ मुहूर्त होता है। पापों का शमन करने के कारण इसे 'कुतुप' नाम दिया गया है।
समय: आमतौर पर यह दोपहर 11:30 बजे से 12:30 बजे के मध्य रहता है।
महत्व: श्राद्ध कर्म का संकल्प लेने और तर्पण की शुरुआत करने के लिए कुतुप काल को सबसे उत्तम समय माना जाता है।
2. रोहिणी काल (9वाँ मुहूर्त)
सामान्य ज्योतिष में रोहिणी मुहूर्त चंद्रमा के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने पर बनता है, परंतु श्राद्ध पक्ष में इसका संदर्भ अलग होता है।
समय: श्राद्ध के लिए रोहिणी काल सूर्योदय से सूर्यास्त के कुल समय को 15 भागों में बाँटने पर 9वाँ मुहूर्त होता है। यह कुतुप काल के तुरंत बाद आता है।
महत्व: दोपहर के इस समय में किया गया पिंड दान और ब्राह्मण भोजन पितरों को पूर्ण तृप्ति प्रदान करता है।
3. अभिजीत मुहूर्त
विशेषता: अभिजीत मुहूर्त प्रतिदिन के सूर्योदय के अनुसार थोड़ा परिवर्तित होता है (ध्यान रहे कि बुधवार के दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं होता है)।
महत्व: यह कुतुप और रोहिणी काल के आसपास का ही समय होता है। यदि किसी कारण कुतुप काल न मिल पा रहा हो, तो अभिजीत मुहूर्त में भी पितृ कर्म किया जा सकता है।
4. अपराह्न काल (दिन का 4था भाग)
वैदिक काल-गणना के अनुसार सूर्योदय से सूर्यास्त तक के पूरे दिनमान को 5 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है:
प्रातःकाल
संगव काल
मध्याह्न काल
अपराह्न काल
सायाह्न काल
समय का गणित: यदि दिन 12 घंटे का माना जाए (सुबह 6:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक), तो अपराह्न काल दोपहर 01:12 बजे से अपराह्न 03:36 बजे तक रहता है।
महत्व: शास्त्रों में श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण के लिए अपराह्न काल को सर्वोपरि स्थान दिया गया है।
अपराह्न काल का धार्मिक एवं आध्यात्मिक नियम
पितरों का समय: माना जाता है कि दोपहर के समय (कुतप और रोहिणी मुहूर्त के बाद) जब सूर्य पश्चिम की ओर ढलने लगता है, तब पितर तर्पण और जल ग्रहण करने के लिए सबसे अधिक तत्पर रहते हैं।
देव-कार्य और पितृ-कार्य का अंतर: अपराह्न काल का मुख्य समय पितृ-तर्पण के लिए आरक्षित होता है। इसी कारण शास्त्रों में देव-पूजन व अन्य शुभ धार्मिक कार्य मध्याह्न काल (दोपहर 12:00 बजे से पहले) संपन्न करने का निर्देश दिया जाता है।
शैली प्रकाश
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