शारदीय नवरात्रि में करें श्रीयंत्र की पूजा, पाएं श्रीमहालक्ष्मी जी से वरदान
सृष्टि में जो कुछ भी है उन सबका मूल स्थान 'श्रीयंत्र' ही है। शास्त्र कहते हैं कि ‘श्रयते या सा श्री:, अर्थात जो परब्रह्म का आश्रयण करती है वही श्री है। यंत्रम का अर्थ है, गृह, वास अथवा निवास। अतः जहा परब्रह्म परमेश्वरी 'श्री' का वास है वही गृह है, इससे सिद्ध होता है कि परब्रह्म एवं उनकी शक्ति का सम्यक रूप ही 'श्रीयंत्र' है। पौराणिक मान्यताओं में भी 'यंत्र' शब्द गृह के लिए प्रयोग होता है अतः यह विश्व ही श्री विद्या का गृह है जिसमे ब्रह्म एवं उनकी शक्ति परमेश्वरी एकाकार रूप में विद्यामान रहते हैं। न शिवेन बिना देवी न देव्या च बिना शिवः। अर्थात- परब्रह्म शिव से उनकी शक्ति अभिन्न है न शिव के बिना शक्ति हैं और न ही शक्ति के बिना शिव। दोनों प्रकृति एवं पुरुष ॐकार हैं इसीलिए श्रीयंत्र रूप त्रिपुरसुंदरी का गृह, जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति तथा प्रमाता, प्रमेय, प्राणरूप से त्रिपुरात्मक एवं सूर्य-चन्द्र-अग्नि भेद से त्रिखंडात्मक कहलाता है।
चतुर्भिः शिवचक्रैश्च शक्तिचक्रैश्च पंचिभिः। शिवशक्त्यात्मकं ज्ञेयं श्रीचक्रम शिवयोर्वपु:।।
मूलरूप से श्रीयंत्र नौ चक्रों में जिनमें पाँच शक्ति के और चार शिव के हैं, से बना हुआ तेजस्रयात्मक है जिनमें त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार ये पाँच अधोमुख त्रिकोण शक्तिचक्र हैं। बिंदु, अष्टदल, षोडशदल और चतुरस्र ये चार ऊद्धर्मुख त्रिकोण शिव के हैं। 'यतपिंडे तत ब्राह्मांडे' अर्थात जो पिंड में है वही ब्रह्माण्ड में है। पिंड यानी शरीर में इनका स्थान भ्रूमध्य-आज्ञाचक्र, लम्बिका-इन्द्र्योनी, कंठ-बिशुद्धि, ह्रदय-अनाहत, नाभि-मणिपुर, वस्ति-स्वाधिष्ठान, मूलाधार-मूलाधार तथा तदधोदेश-कुल हैं।
इन्हें ही सृष्टिकर्ता, पालन एवं प्रलयकर्ता माना गया है इनमें बिन्दुचक्र शिव की मूल प्रकृति से बना होने के कारण प्राकृत स्वरूप है। शेष आठ चक्र प्रकृति-विकृति उभयात्मक हैं। विन्दु, त्रिकोण एवं अष्टार ये सृष्टिकर्ताचक्र हैं। अन्तर्दशार, बहिर्दशार एवं चतुर्दशार पालनकर्ता चक्र है तथा अष्टदल,षोडशदल और सहस्रदल (भुपुर) ये संहारकर्ता चक्र हैं। विंदुचक्र शिववास है। जहां शिव विश्राम करते हैं इस प्रकार ही सम्पूर्ण श्रीयंत्र है। इन्हीं विन्दुचक्र में सृष्टि की समस्त शक्तियाँ निहित हैं जिनमें सभी कलाएं, सभी तत्व, पंचकोश, पञ्चवायु, पुरुषार्थ चतुष्टय, सभी ग्रह, उपग्रह, सभी रिद्धियाँ-सिद्धिंयाँ आदि वास करती हैं।
शास्त्रों के अनुसार जितने भी यंत्र हैं उन सभी का प्रादुर्भाव श्रीयंत्र से ही हुआ है अतः श्रीयंत्र की पूजा-आराधना करने से सभी यंत्रों का फल एकसाथ मिल जाता है इनकी पूजा के पश्च्यात फिर किसी यंत्र की साधना शेष नही रहती। उससे भी बड़ी बात यह है कि इस यंत्र की आराधना निष्फल नहीं रहती। यंत्र के इसी प्रभावको ध्यान में रखकर स्वयं ब्रह्म ज्ञानियों ने इन्हें 'यंत्रराज' कहा है। शारदीय नवरात्र पर श्रीयंत्र की विधि प्रकार पूजा-आराधना करके स्फटिक अथवा कमलगट्टे की माला से ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नमः मंत्र का जप प्रतिदिन 11 माला जपने से माँ श्रीशक्ति की असीम कृपा प्राप्त होती है जिससे प्राणी अपने सभी मनोरथ पूर्ण करा सकता है।