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Magh Month 2021: 29 जनवरी से माघ महीना आरंभ, जानिए इस मास में स्न्नान और दान का क्या है महत्व

Wed, 27 Jan 2021 08:02 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद, नई दिल्ली
अनीता जैन, वास्तुविद, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 27 Jan 2021 08:02 AM IST
सार

  • 29 जनवरी से माघ मास की होगी शुरुआत
  • माघ मास में  प्रयाग, कुरुक्षेत्र , हरिद्धार, काशी , नासिक, उज्जैन तथा अन्य पवित्र तीर्थों और नदियों में स्नान का बड़ा महत्व

 

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magh month 2021 magh maas start date know importance and auspicious of this month
magh mela 2021: शास्त्रों में माघ माह के स्नान, दान, उपवास और माधव पूजा का महत्व - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

29 जनवरी, शुक्रवार से माघ का महीना शुरू हो रहा है और 27 फरवरी, 2021 को समाप्त हो जाएगा। स्नान, दान कर पुण्य अर्जित करने के लिए माघ का महीना बहुत ही उत्तम माना गया है। मोक्ष प्रदान करने वाला माघ स्नान, पौष पूर्णिमा से आरम्भ होकर माघ पूर्णिमा को समाप्त होता है। माघ मास की ऐसी ही महिमा है कि इसमें जहाँ कही भी जल हो वह गंगाजल के सामान ही होता है, फिर भी प्रयाग, कुरुक्षेत्र , हरिद्धार, काशी , नासिक, उज्जैन तथा अन्य पवित्र तीर्थों और नदियों में स्नान का बड़ा महत्व है। माघ स्नान करने वाले मनुष्यों पर भगवान विष्णु प्रसन्न रहते है तथा उन्हें सुख-सौभग्य,धन-संतान और मोक्ष प्रदान करते है।

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क्या होता है कल्पवास
प्रयाग में हर वर्ष लगने वाले इस मेले को कल्पवास भी कहा जाता है। वेद, मंत्र व यज्ञ आदि कर्म ही 'कल्प' कहे जाते है। पुराणों में माघ मास के समय संगम के तट पर निवास को ही कल्पवास कहा जाता है। संयम,अहिंसा व श्रद्धा ही कल्पवास का मूल आधार होता है । यदि सकामभाव से माघ स्नान किया जाय तो उससे मनोवांछित फल की सिद्धि होती है और निष्काम भाव से स्नान आदि करने पर वह मोक्ष देने वाला होता है ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
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मिलेगी नारायण की कृपा
शास्त्रों में माघ माह के स्नान, दान, उपवास और माधव पूजा का महत्व बताते हुए कहा गया है कि इन दिनों में प्रयागराज में अनेक तीर्थों का समागम होता है इसलिए जो प्रयाग या गंगा आदि अन्य पवित्र नदियों में भी भक्तिभाव से स्नान करते है वह तमाम पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक के अधिकारी हो जाते है। इस माह के महत्व पर तुलसीदास जी ने श्री रामचरित्र मानस के बालखण्ड में लिखा है-'माघ मकर गति रवि जब होई ,तीरथपतिहिं आव सब कोई !!'अर्थात माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में आते हैं तब सब लोग तीर्थों के राजा  प्रयाग के पावन संगम तट पर आते हैं देवता, दैत्य ,किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं ''। वैसे तो प्राणी इस माह में किसी भी तीर्थ , नदी और समुद्र में स्नान कर दान -पुण्य करके कष्टों से मुक्ति पा सकता है लेकिन प्रयागराज संगम में स्नान का फल मोक्ष देने वाला है।
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धर्मराज युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध के दौरान मारे गए अपने रिश्तेदारों को सदगति दिलाने हेतु मार्कण्डेय ऋषि के कहने पर कल्पवास किया था। गौतमऋषि द्वारा शापित इंद्रदेव को भी माघ स्नान के कारण श्राप से मुक्ति मिली थी। माघ के धार्मिक अनुष्ठान के फलस्वरूप प्रतिष्ठानपुरी के नरेश पुरुरवा को अपनी कुरूपता से मुक्ति मिली थी। माघ मास में जो पवित्र नदियों में स्नान करता है उसे एक विशेष प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है ,जिससे उसका शरीर निरोगी और आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न हो जाता है। माघ स्नान से शरीर के पाप जलकर भस्म हो जाते है एवं इस मास में पूजन-अर्चन व स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है। स्कन्द पुराण के अनुसार इस मास में शीतल जल में डुबकी लगाने से मनुष्य पाप मुक्त होकर स्वर्ग चले जाते है।

माघ माह के व्रत-त्यौहार
माघ माह के दौरान कृष्ण पक्ष में सकट चौथ (गणेश चतुर्थी व्रत )षटतिला एकादशी,मौनी अमावस्या आती है तो शुक्ल पक्ष में वरदतिलकुन्द-विनायक चतुर्थी,वसंत पंचमी,शीतला षष्ठी,रथ-अचला सप्तमी,जया एकादशी व्रत और माघी पूर्णिमा जैसे पर्व आते है। मकर संक्रांति से ही देवों के दिन शुरू होते है,उत्तरायण शुरू होता है। गंगापुत्र भीष्म ने अपनी देह का त्याग उत्तरायण में किया था।


सूर्य उपासना और दान-पुण्य 
पदम् पुराण के अनुसार सभी पापों से मुक्ति और भगवान जगदीश्वर की कृपा  प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान कर सूर्य मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य को अर्घ्य अवश्य प्रदान करना चाहिए ।भविष्य पुराण के अनुसार सूर्यनारायण का पूजन करने वाला व्यक्ति प्रज्ञा, मेधा तथा सभी समृद्धियों से संपन्न होता हुआ चिरंजीवी होता है । यदि कोई व्यक्ति सूर्य की मानसिक आराधना भी करता है तो वह समस्त व्याधियों से रहित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है । व्यक्ति को अपने कल्याण के लिए सूर्यदेव की पूजा अवश्य करनी चाहिए । इस मास में तिल,गुड़ और कंबल के दान का विशेष महत्त्व माना गया है । ऊनी वस्त्र ,रजाई,जूता एवं जो भी शीतनिवारक वस्तुएँ हैं उनका दान कर 'माधवः प्रीयताम' यह वाक्य कहना चाहिए।

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