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गरुड़ पुराण में रात्रि में शव जलाना वर्जित, लेकिन इन तीन महाश्मशानों में 24 घंटे होता है अंतिम संस्कार

Wed, 07 Oct 2020 06:37 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 07 Oct 2020 06:37 PM IST
सार

  • सनातन धर्म के विधानों के मुताबिक संध्या काल के बाद अंतिम संस्कार से संबंधित कोई भी क्रिया करना वर्जित, श्राद्ध तर्पण तक की मनाही
  • तीन महाश्मशानों में ही हो सकता है रात के वक्त अंतिम संस्कार, लेकिन अब दिल्ली में भी रात 10 बजे तक होने लगा है अंतिम संस्कार

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Last rites in Hindu religion at night in Garuda Purana is forbidden, but the hindu cremation rituals are performed 24 hours in these three crematorium
मणिकर्णिका घाट - फोटो : अमर उजाला (फाइल)

विस्तार

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मृत्यु किसी भी जीवन का अटल सत्य है। अलग-अलग धर्मों की अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर की अंतिम क्रिया की जाती है। इसके बाद मृतक की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार संध्या काल के पश्चात मानव शरीर का अंतिम संस्कार करना वर्जित है। यहां तक कि पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण का कार्य भी संध्या काल के पश्चात नहीं किया जाता है। लेकिन जिन तीन स्थानों को 'महाश्मशान' की संज्ञा दी जाती है, उनमें चौबीसों घंटे अंतिम संस्कार करने की अनुमति धर्मशास्त्रों में दी गई है।

काशी गुरुकुल, वाराणसी के संचालक डॉ. रमाकांत पटेरिया ने अमर उजाला को बताया कि सनातन धर्म के दो ग्रंथों 'गरुड़ पुराण के प्रेत खंड' और 'श्राद्ध प्रकाश' में मनुष्य की मृत्यु और इसके बाद की यात्रा के बारे में विषद व्याख्या की गई है। इन ग्रंथों में बताया गया है कि संध्या काल के पश्चात अंतिम क्रिया नहीं की जानी चाहिए। यह व्यवस्था सभी श्मशान घाटों के लिए लागू है। अगर रात्रि काल में किसी व्यक्ति का देहावसान हो जाता है, तो भी अंतिम क्रिया के लिए सूर्योदय होने की प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए।

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वाराणसी, उज्जैन और काठमांडू में हैं महाश्मशान

डॉ. रमाकांत पटेरिया ने कहा कि तीन श्मशान घाटों को 'महाश्मशान' की संज्ञा दी गई है- वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, उज्जैन के महाकाल मंदिर के पास बना हुआ श्मशान घाट और नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के पास बना श्मशान घाट। भगवान शिव से जुड़े होने के कारण इन घाटों को महाश्मशान कहा जाता है। यहां चौबीसों घंटे अंतिम संस्कार किए जाने की अनुमति है।

मणिकर्णिका घाट का महत्व क्यों

पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं अपने निवास के लिए काशी की रचना की थी। यह भी कहा जाता है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई है। इस नगरी के निर्माण के पश्चात उन्होंने भगवान विष्णु को यहां धार्मिक कार्य करने के लिए भेजा था। यहां आकर भगवान विष्णु ने मणिकर्णिका घाट पर हजारों सालों तक तपस्या की थी। इसी कारण इस घाट का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है।
कहा जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर हजारों सालों से चिताएं जल रही हैं और यह कभी भी पूरी तरह शांत नहीं होती। स्वयं भगवान शिव यहां औघड़ के रूप में विराजते हैं। यहां दाह संस्कार हुए व्यक्ति का कभी पुनर्जन्म नहीं होता है और वह जन्म-मृत्यु के बंधन से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है। होली के समय यहां चिता की राख से होली खेलने की परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है।

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निगमबोध घाट पर भी चौबीसों घंटे अंतिम संस्कार

राजधानी दिल्ली के निगमबोध घाट के पंडित संजय शर्मा ने बताया कि धर्मशास्त्रों के मुताबिक सायंकाल के बाद अंतिम संस्कार करने की अनुमति नहीं है। लेकिन बदलते समय में लोगों के पास इतनी सुविधा नहीं है कि अगर रात्रि काल में किसी का देहावसान हो जाता है, तो मृतक शरीर को लंबे समय तक रखा जा सके। यही कारण है कि अब लोग देर रात भी अंतिम संस्कार कर देते हैं।

उन्होंने बताया कि दिल्ली में निगमबोध घाट एकमात्र ऐसा श्मशान घाट है जो चौबीसों घंटे चालू रहता है। इसके अलावा बाकी सभी श्मशान घाटों को शाम आठ बजे के बाद बंद कर दिया जाता है। लेकिन यहां भी ज्यादातर अंतिम संस्कार दिन के समय ही हो जाते हैं। रात्रि के समय अधिकतम 10 बजे तक दाह-संस्कार होता है। इसके बाद कभी-कभार इक्के-दुक्के दाह-संस्कार ही होते हैं।

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