श्लोक और मंत्र जाप करते हैं, तो जानिए क्या है दोनों में अंतर
पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में मंत्र और श्लोकों का उच्चारण और जाप अवश्य किया जाता है। मंत्र और श्लोक साधक को आध्यात्म की ओर यानि ईश्वर के समीप ले जाने का कार्य करते हैं। मंत्र एवं श्लोक को पढ़ने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। दोनों की ही रचना संस्कृत भाषा में मिलती हैं और लगभग इनका उच्चारण भी एक समान होता है। इसी कारण श्लोक और मंत्र जप करने वाले कई लोगों को भी यही लगता है कि ये दोनों एक ही हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि इन दोनों में बहुत अंतर है। ये दोनों ही अलग-अलग विषय हैं। तो चलिए जानते हैं कि मंत्र व श्लोक दोनों में क्या अंतर है।
मंत्र का अर्थ वैसे तो असीमित है, लेकिन मंत्र उसे कहा जाता हैं जो मन के भाव से सीधे से उत्पन्न हुए हो। लिखकर उनकी रचना न की हो, जो स्वयं उत्पन्न हुआ हो। हमारे वेदों की ऋचाओं के प्रत्येक छंद को मंत्र कहा जाता है क्योंकि माना जाता है कि ये ऋचाएं किसी के द्वारा ने लिखी नहीं गई थी, स्वयं मन से उत्पन्न हुई हैं। इसलिए इन्हें मंत्र कहा जाता है। शास्त्रों में मंत्र के बारे में कहा गया है कि मन को तारने वाली ध्वनि ही मंत्र है। श्रीं, ऊं आदि एक शब्द होते हुए भी मंत्र हैं और अपने अंदर बहुत कुछ समेटे हुए हैं।
मंत्र किसी के मन से स्वयं उत्पन्न है तो वहीं श्लोक का अर्थ होता है जो किसी के द्वारा लिखा गया रचित हो, वह श्लोक कहलाता है। कई ग्रंथों में लिखी गई दो या चार पंक्तियों की रचना को श्लोक कहा जाता है। इन श्लोकों के द्वारा ईश्वर की स्तुति या प्रशंसा की जाती है। कई श्लोकों का अर्थ बहुत गूढ़ होता है। महाभारत, वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण आदि ग्रंथ ऋषि-मुनियों रचित यानि लिखे गए हैं। इन ग्रंथों में लिखें गए श्लोक मनुष्य को जीवन की सही राह दिखाते हैं।