फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   know history and importance of shiv khori cave

जानें किस गुफा में आज भी आरती के दौरान भगवान शिव के होते हैं दिव्य दर्शन

Sun, 16 Jun 2019 10:54 PM IST
Madhukar Mishra अनीता जैन, वास्तुविद्
अनीता जैन, वास्तुविद् Published by: Madhukar Mishra Updated Sun, 16 Jun 2019 10:54 PM IST
विज्ञापन
know history and importance of shiv khori cave
shiva khori - फोटो : Rohit Jha
शिवखोड़ी गुफा शिवालिक पर्वत की श्रृंखलाओं में एक प्राकृतिक व अतिप्राचीन गुफा है, जिसमें प्रकृति-निर्मित शिवलिंग और अन्य दुर्लभ मूर्ति स्वरूप में शैलचित्र भी विराजमान है। शिवखोड़ी शिवभक्तों के लिए एक महान तीर्थस्थल है। जम्मू-कश्मीर राज्य के जम्मू से कुछ दूरी पर स्थित है रयासी जिला। यही पर भगवान शिव का घर कही जानेवाली शिवखोड़ी गुफा स्थित है और आश्चर्य की बात यह हैं कि इसी गुफा का दूसरा छोर अमरनाथ गुफा में खुलता है। जी हां शिवखोड़ी है शिव भक्तों की आस्था का केंद्र बिंदु।
विज्ञापन


इस चमत्कारी गुफा में अपने परिवार के साथ विराजते हैं देवों के देव महादेव भोले शिवशंकर। यहां जाने के लिए सबसे अच्छा मौसम अप्रैल से लेकर जून तक है। इस दौरान यहां का मौसम बेहद सुहावना और हल्का ठंडा रहता है। दरअसल प्रकृति की गोद में बसी हुई यह एक ऐसी दुर्लभ जगह है, जहां आदिकाल से ही अब तक भगवान शिव की महिमा बनी हुई है, वह भी अपने आप।
विज्ञापन

know history and importance of shiv khori cave
जिस गुफा में होते हैं शिव के दर्शन

जहां बहता है दूध सा सफेद जल

शिवखोड़ी गुफा में 33 कोटि देवी-देवता करते हैं। यह स्थान जम्मू से करीब 140 कि.मी. एवं कटरा से 85 कि.मी.दूर उधमपुर ज़िले में स्थित है। रनसू (रणसू) से शिवखोड़ी की गुफा करीब 3.5 कि.मी. दूर रह जाती है। बस इसी स्थान से पैदल या खच्चर के द्वारा बाबा भोलेनाथ की यात्रा प्रारम्भ हो जाती है। रनसू से थोड़ा आगे चलने पर लोहे का एक छोटा सा पुल आता है, जो नदी पर बना हुआ है। इस नदी को दूध गंगा कहते हैं कारण यह है कि महाशिवरात्रि के दिन इस नदी का जल स्वतः ही दूध के समान सफ़ेद हो जाता है। 

क्रीड़ा करती प्रकृति के वैभव को निहारते हुए आगे चलने पर एक कुंड आता है, जिसे अंजनी कुंड कहते हैं। इस कुंड के पास ही भगवान नीलकंठ की सवारी 'नंदी बैल' के पैरों के निशान हैं। ऐसी मान्यता है कि नंदी बैल इस कुंड में पानी पीने आता था। इस कुंड में छोटी-बड़ी काफी मछलियां हैं, यात्रीगण मछलियों को आटे की गोलियां खिलाकर पुण्य कमाते हैं।

know history and importance of shiv khori cave
जिस गुफा में होते हैं शिव के दर्शन

इन जयकारों के संग बढ़ते हैं भक्तों का जत्थे

हर-हर महादेव, बम-बम भोले, भोले तेरा रूप निराला शिवखोड़ी में डेरा डाला — जैसे जयकारों के साथ भक्त काफिले में आगे बढ़ते रहते हैं। हर कोई उमंग के साथ शिव गुफा को जल्दी से जल्दी छूने के प्रयास में यहां दौड़े जाता हैं। करीब एक किलोमीटर आगे चलने पर 'लक्ष्मी-गणेश' का मंदिर आता है। इस मंदिर के अंदर छोटी सी गुफा में प्राचीन लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति है। नीचे से बहती हुई दूध गंगा की कल-कल ध्वनि मंदिर की शोभा को और बढ़ा देती है। यहां से प्रसाद की दुकानें शुरू हो जाती हैं, जहां से श्रद्धालुजन गंगाजल, बिल्वपत्र, प्रसाद आदि पूजा के लिए खरीदते हैं। झूमते हुए वृक्ष, ठंडी-ठंडी हवा के झोंकों और बाबा के जयकारों के साथ जैसे ही भक्तों को गुफा के दर्शन होते हैं, तब उनके आनंद की अनुभूति कई गुना बढ़ जाती है।

विज्ञापन

know history and importance of shiv khori cave
जिस गुफा में होते हैं शिव के दर्शन

पवित्र गुफा में इस तरह करना होता है प्रवेश

पवित्र गुफा के बाहर हवन कुंड है। इसी के पास लॉकर में मोबाइल, पर्स, जूते-चप्प्पल आदि जमा करने की पूरी व्यवस्था हैं। गुफा के लिए लगभग 50 -60 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचना होता है। गुफा के पास ही जम्मू-कश्मीर पुलिस की सुरक्षा चौकी है, जो सुरक्षा की दृष्टि से यात्रियों की तलाशी लेने के बाद ही आगे बढ़ने देती है। गुफा के बाईं ओर बाबा रमेशगिरि जी (मुख्य व्यवस्थापक) की कुटिया है, जहां अखंड ज्योति जलती रहती है। 

गुफा का प्रवेश द्वार करीब 15 से 20 फुट चौड़ा है। गुफा में आगे बढ़ने पर तंग रास्ता है, जिस तरह वैष्णो देवी की प्राचीन गुफा है, उसी प्रकार कहीं लेटकर, कहीं तिरछे होकर, कहीं घुटनों के बल तो कहीं बैठकर जाना पड़ता है। थोड़ा आगे चलकर गुफा गहरी और चौड़ी हो जाती है, जहां आराम से यात्री खड़े हो सकते हैं। यहां से दाएं घूमकर पांच-छः सीढ़ियां चढ़कर भगवान शिव का स्थान है, जहं स्वयंभू शिव-शक्ति समाधि रूप में विराजमान हैं। माता पार्वती के सामने ऊपर की ओर कार्तिकेय एवं पंचमुखी गणेश विराज रहे हैं।

know history and importance of shiv khori cave
जिस गुफा में होते हैं शिव के दर्शन - फोटो : ANI

जानें इस गुफा का बाबा अमरनाथ से क्या है संबंध

मान्यता के अनुसार यहाँ सुबह-शाम आरती के समय 33 कोटि देवी-देवता शिवजी की स्तुति करते है। शिवलिंग के ठीक ऊपर की शिला में कामधेनु गाय का आकार बना हुआ है, जिसका थन स्पष्ट दिखाई देता है, जिसमें से बूँद-बूँद जल शिवलिंग पर निरंतर गिरता रहता है। इसके बारे में मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन यह जल दूध की तरह सफ़ेद हो जाता है। शिवलिंग के ऊपर बाईं तरफ, त्रिशूल, डमरू, विष्णु भगवान के शंख, चक्र एवं ॐ और कृष्ण भगवान के कालिया शेषनाग के चिह्न शिलाओं पर स्पष्ट नज़र आते हैं। गुफा के अंदर थोड़ा आगे बढ़ने पर माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी एवं महाकाली तीन पिण्डियों के रूप में विराजमान हैं। जिनके आधार में सदैव पवित्र जल भरा रहता है। बड़ी श्रद्धा से जल को भक्तगण अपने ऊपर छिड़कते हैं। 

इनके पास ही बाईं शिला पर पांच पांडवों की पिंडियां हैं। इसी के पास एक सुरंग बनी हुई है, पौराणिक मत के अनुसार इसी गुफा से होकर पांडव स्वर्ग को गए थे। इसी परिसर में एक छोटा स्वयंभू शिवलिंग है, जिसके साथ ही भगवान शंकर लेटी हुई मुद्रा में नज़र आते हैं और उनके ऊपर माँ काली का चरण भी साफ़ दिखाई देता है। यहीं से सामने देखने पर एक बड़ी गुफा दिखाई देती है। मान्यता है कि यहां से एक रास्ता अमरनाथ को जाता है। बहुत समय पहले इसी गुफा से होकर दो साधु अमरनाथ गए थे, जिनमें से एक तो छः महीने पश्चात् अमरनाथ पहुंच गए परन्तु दूसरे साधु का कुछ भी पता नहीं लग पाया। परअब यह गुफा सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दी गई है। मान्यता है कि यहाँ आकर जो भी मनोकामना मांगीं जाती है, वह अवश्य पूरी होती है।

know history and importance of shiv khori cave
जिस गुफा में होते हैं शिव के दर्शन

जहां भस्मासुर से बचने के लिए गुफा में छिपे शिव

पुराणों के अनुसार इस गुफा को अपने त्रिशूल की नोक से स्वयं भगवान शंकर ने बनाया था। कथा के अनुसार दैत्य भस्मासुर ने अपनी तपस्या से भोले शंकर को प्रसन्न कर वर मांगा कि हे भगवन! मैं जिसके भी सिर पर भी हाथ रखूं वह जलकर भस्म हो जाए। भगवान शिव ने कहा-'तथास्तु! ऐसा ही हो'। वरदान पाकर भस्मासुर अपने को सर्वशक्तिमान समझने लगा। मां पार्वती से विवाह की इच्छा से भस्मासुर भगवान शंकर पर ही हाथ रखने के लिए आगे बढ़ा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ, इसलिए जहां युद्ध हुआ, उस जगह का नाम रणसू और अब रनसू पड़ गया।

युद्ध के बाद भी जब भस्मासुर ने हार नहीं मानी तो शिवजी अपने परिवार सहित वहां से निकलकर ऊँची पहाड़ी पर पहुंचे और एक गुफा बनाकर उसमें छुप गए। कालांतर में यही गुफा शिवखोड़ी के नाम से जन-जन की आस्था का केंद्र बनी। मान्यता है कि भगवान शंकर को बचाने के लिए श्री विष्णु जी ने सुन्दर स्त्री मोहिनी का रूप लेकर भस्मासुर को मोहित किया। मोहिनी के रूप में विष्णु जी के साथ नृत्य के दौरान भस्मासुर भगवान शिव का दिया हुआ वरदान भूल गया और अपने ही सिर पर हाथ रखकर भस्म हो गया।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed