जानिए क्या होता है चंद्रायण व्रत, जिसको करने से हो जाता है हर पाप का प्रायश्चित
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चंद्रायण व्रत इसके बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होती है। यह व्रत बहुत ही प्राचीन और लाभप्रद है। प्राचीन काल में ऋषि मुनियों के द्वारा इस व्रत को किया जाता था और वे लगातार इस उपवास को करते हुए स्वस्थ रहते थे। हालांकि आज के समय में भी कुछ साधक इस व्रत को करते हैं। यह केवल एक व्रत नहीं बल्कि चंद्रायण साधना होती है। इस व्रत का मूल विधान चंद्रमा की सोलह कलाओं के अनुसार भोजन के कौर से संबद्ध है। यह व्रत अत्यंत कठिन होता है लेकिन यह उतना ही शुभफलदायक भी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से सभी पापों का प्रायश्चित संभव है। जानते हैं कि कैसे किया जाता है चंद्रायण व्रत और क्या है इसका महत्व।
चंद्रायण व्रत में भोजन को पंद्रह हिस्सों में विभाजित किया जाता है। इसका आरंभ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से किया जाता है। प्रथम दिन एक कौर भोजन, द्वितीया को दो कौर भोजन और तृतीया को तीन कौर भोजन इस तरह से प्रतिदिन एक एक कौर भोजन बढ़ाया जाता है और इस तरह से पूर्णिमा तिथि आने तक पंद्रह कौर भोजन हो जाता है। इसके बाद जब पूर्णमासी आती है तो उस दिन पूरा भोजन कर लिया जाता है क्योंकि इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होता है।
इसके बाद फिर से हर दिन भोजन को कम किया जाता है। कृष्ण पक्ष के आरंभ के साथ ही भोजन के सोलहवें हिस्से में से चंद्रमा की घटती कलाओं के साथ एक एक कौर कम करते जाते हैं और फिर अमावस्या को पूरी तरह से उपवास किया जाता है। इस तरह से चंद्रमा की कलाओं के साथ यह व्रत पूरे एक माह में पूर्ण होता है।
- चंद्रायण व्रत के करते समय ब्रह्मचार्य को पूर्णतया पालन करना चाहिए। अपने मन में भी केवल सकारात्मक और सात्विक विचार रखने चाहिए।
- चन्द्रायण व्रत के दौरान संध्या वंदन, स्वाध्याय, देव पूजा, गायत्री जप, हवन आदि धार्मिक कृत्यों को नित्य नियम के साथ करना चाहिए।
- चंद्रायण व्रत के दिनों में भूमि शयन करना चाहिए।
- इस व्रत के दौरान प्रतिदिन 40 माला या फिर कम से कम 11 माला गायत्री मंत्र का जापकरना चाहिए। इससे साधना का फल प्राप्त होता है। व्रत पूर्ण होने पर यज्ञादि करवाना चाहिए इसके साथ ही दान भी करना चाहिए।
- एक माह तक चलने वाले इस व्रत के साथ एक सवा लाख गायत्री मंत्र जप अनुष्ठान, प्रतिदिन 40 माला या कम से कम 11 माला जप अनुष्ठान करन से साधना का फल अधिक मिलता हैं। व्रत की समाप्ति के बाद यज्ञादि अवश्य करें और अपनी कमाई में से कुछ धन दान करें।