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क्या है मोहर्रम की दस तारीख का महत्व
नय्यर फिरोज
Updated Thu, 14 Nov 2013 07:43 PM IST
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मोहर्रम की दस तारीख को यौमे आशूरा कहा जाता है। मोहर्रम हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है। इसी महीने से नया हिजरी साल शुरू होता है। मोहर्रम की दस तारीख से इस्लामी इतिहास की बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हैं। इसीलिए इस महीने का मुसलमान बहुत आदर करते हैं।
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इस महीने की दस तारीख अर्थात यौमे आशूरा को ईशदूत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कुबूल हुई थी। मोहर्रम की दस तारीख को ही नूह अलैहिस्सलाम की किश्ती भयंकर तूफान में घिरने के बाद जूदी पहाड़ पर ठहरी थी। यौमे आशूरा को ही मूसा अलैहिस्सलाम को फिरऔन के जुल्म से निजात मिली थी।
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इसी दिन अय्यूब अलैहिस्सलाम को लंबी बीमारी से स्वास्थ्य लाभ मिला था। दस मोहर्रम को ही यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट से बाहर निकले थे। आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को एक ऐसी घटना हुई थी, जिसका विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है।
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इराक स्थित कर्बला में हुई यह घटना दरअसल सत्य के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस घटना में हजरत मुहम्मद के नवासे (नाती) हजरत हुसैन को शहीद कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
मोहर्रम की दस तारीख को अधिकतर मुसलमान रोजा रखते हैं। मुहम्मद सल्लम ने कहा कि इस दिन यहूदी मूसा अलैहिस्सलाम की याद में रोजा रखते हैं, इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे मोहर्रम की नौ-दस या दस-ग्यारह तारीख का रोजा रखें।