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Katha: जानिए गरुड़ कैसे बने भगवान विष्णु के वाहन, पढ़िए पौराणिक रोचक कथा

Fri, 01 Sep 2023 07:22 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Fri, 01 Sep 2023 07:22 AM IST
सार

मां शेरावाली का वाहन सिंह है, गणेश जी का मूषक, देवी सरस्वती का हंस, कार्तिकेय का मोर और भगवान शिव का नंदी ,ठीक उसी तरह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ हैं।

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interesting mythological story know about how garuda became the vehicle of lord vishnu

विस्तार

हिंदू धर्मग्रंथों में अनेक देवी-देवताओं के स्वरूप और चरित्र का वर्णन किया गया है। प्रत्येक देवी-देवता का उनके स्वरूप ,आचरण और व्यवहार के अनुरूप ही उनका वाहन होता है। हर देवता अपने वाहन के माध्यम से प्रकृति के एक विशिष्ट गुण का प्रतिनिधित्व करता है। मां शेरावाली का वाहन सिंह है, गणेश जी का मूषक, देवी सरस्वती का हंस, कार्तिकेय का मोर और भगवान शिव का नंदी ,ठीक उसी तरह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ हैं।
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कौन हैं गरुड़?
गरुड़ ऐसा पक्षी है जो आकाश में बहुत ऊंचाई पर उड़कर भी पृथ्वी के छोटे-छोटे जीवों पर नज़र रख सकता है। गरुड़ सांपों का शत्रु होता है। इस कारण कहा जाता है कि यह विष को ख़त्म करने वाला अर्थात आतंक को नष्ट करने वाला पक्षी है। ऐसे ही परम शक्तिशाली भगवान विष्णु सबका पालन करने वाले हैं। उनकी नज़र प्रत्येक जीव पर होती है। विष्णु जी के वाहन से सदैव अपनी दृष्टि पैनी बनाए रखने एवं जागरूक बने रहने की प्रेरणा मिलती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, गरुड़ की मां का नाम विनिता था जो प्रजापति कश्यप की पत्नी थीं। गरुड़ एक विशाल, अतिबलिष्ठ और अपने संकल्प को पूरा करने वाला पक्षी था, जिसे भगवान विष्णु से अमृत्व मिला था।
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ऐसे बना गरुड़ विष्णुजी का वाहन
पौराणिक कथा के अनुसार स्वर्ग में देवताओं ने युद्ध करने के बाद जिस अमृत कलश को असुरों से प्राप्त किया था, गरुड़ ने उसे देवताओं से छीन लिया था क्योंकि इससे वह अपनी मां को सांपों की माँ कद्रू की दासता से मुक्ति दिलाना चाहते थे। कद्रू ने यह प्रस्ताव रखा कि, यदि तुम मेरे पुत्रों के लिए अमृत ला दोगे तो तुम्हारी मां दासत्व से मुक्त हो जाएगी। इसके लिए गरुड़ स्वर्ग पहुंचे और देवताओं की सुरक्षा व्यवस्था को भंग करके अमृत लेकर उड़ गए। सभी देवताओं ने अमृत कलश को बचाने का खूब प्रयास किया, लेकिन गरुड़ अपने मुख से अमृत लेकर उड़ गए। गरुड़ अमृत कलश लेकर कद्रु के पास पहुंचा और उससे बोला- “माते ! अपनी प्रतिज्ञानुसार मैं अमृत कलश ले आया हूं। अब आप अपने वचन से मेरी माता को मुक्त कर दे।” कद्रु ने उसी क्षण विनता को वचन से मुक्त कर दिया और अगली सुबह अमृत नागो को पिलाने का निश्चय कर वहां से चली गई। रात को उचित मौका देखकर इंद्र ने अमृत कलश उठा लिया और पुनः उसी स्थान पर पहुंचा दिया।
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दूसरे दिन सुबह नाग जब वहां पहुंचे तो अमृत कलश गायब देखकर दुखी हुए। उन्होंने उस कुशा को ही जिस पर अमृत कलश रखा था चाटना आरम्भ कर दिया जिसके कारण उनकी जीभ दो हिस्सों में फट गई। गरुड़ की मातृभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ के सम्मुख प्रकट हो गए और बोले- “मैं तुम्हारी मातृभक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूं पक्षीराज ! मैं चाहता हूं कि अब से तुम मेरे वाहन के रूप में मेरे साथ रहा करो।” गरुड़ बोला- “मैं बहुत भाग्यशाली हूं प्रभु जो स्वयं आपने मुझे अपना वाहन बनाना स्वीकार किया। आज से मैं हर क्षण आपकी सेवा में रहूंगा और आपको छोड़कर कही नहीं जाऊंगा।” इस तरह उसी दिन से पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन के रूप में प्रयुक्त होने लगे।
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