माघ माह: इस माह का हर एक दिन होता है पवित्र, लगाएं डुबकी, कमाएं पुण्य
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स्नान और दान कर पुण्य अर्जित करने के लिए माघ का महीना बहुत ही उत्तम है। माघ स्नान, पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा को समाप्त होता है। एक महीने चलने वाला पवित्र माघ स्नान मेला दो से 31 जनवरी तक प्रयाग में आयोजित होता है। प्रयाग में हर वर्ष लगने वाले इस मेले को कल्पवास भी कहा जाता है। वेद, मंत्र एवं यज्ञ आदि कर्म ही 'कल्प' कहे जाते हैं। पुराणों में माघ मास के समय संगम के तट पर निवास को ही कल्पवास कहा जाता है।
संयम, अहिंसा व श्रद्धा ही कल्पवास का मूल आधार होते हैं। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, काशी, नासिक, उज्जैन और अन्य पवित्र तीर्थों पर नदियों में स्नान का बड़ा महत्व है। माघ स्नान करने वाले मनुष्यों पर भगवान विष्णु प्रसन्न रहते हैं और उन्हें सुख-सौभाग्य, धन-संतान और मोक्ष प्रदान करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि सकामभाव से माघ स्नान किया जाए, तो उससे मनोवांछित फल की सिद्धि होती है और निष्काम भाव से स्नान आदि करने पर वह मोक्ष देने वाला होता है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में माघ माह के स्नान, दान, उपवास और माधव पूजा का महत्व बताते हुए कहा गया है कि इन दिनों प्रयागराज में अनेक तीर्थों का समागम होता है, जो प्रयाग या अन्य पवित्र नदियों में भक्तिभाव से स्नान करते हैं, वे तमाम पापों से मुक्त हो जाते हैं। इस माह के महत्व पर तुलसीदास जी ने श्री रामचरित्र मानस के बालखंड में लिखा है- 'माघ मकर गति रवि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।'
धर्मराज युधिष्ठिर ने भी महाभारत युद्ध के दौरान मारे गए अपने रिश्तेदारों को सदगति दिलाने हेतु मार्कण्डेय ऋषि के सुझाव पर कल्पवास किया था। माघ के धार्मिक अनुष्ठान के फलस्वरूप प्रतिष्ठानपुरी के नरेश पुरुरवा को अपनी कुरूपता से मुक्ति मिली थी। माघ मास में, जो पवित्र नदियों में स्नान करता है, उसे एक विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे उसका शरीर निरोगी और आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न हो जाता है। इस मास में पूजन-अर्चना और स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है। स्कन्द पुराण के अनुसार, इस मास में शीतल जल में डुबकी लगाने से मनुष्य पाप मुक्त होकर स्वर्ग चले जाते हैं।
ब्रह्ममुहूर्त में हो स्नान
माघ मास का स्नान कुछ इलाकों में तो सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आते ही यानी मकर संक्रांति के दिन से शुरू होता है, लेकिन अधिकतर स्थानों पर इसकी शुरुआत पौष पूर्णिमा के दिन से ही हो जाती है। स्नान का उत्तम समय सूर्योदय से पूर्व माना जाता है, जब आकाश में तारागण दिखाई दे रहा हो। नारदपुराण के अनुसार, माघ मास में ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने से सभी महापातक दूर हो जाते हैं और प्राजापत्य-यज्ञ का फल प्राप्त होता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदित्य, मरुदगण और अन्य सभी देवी-देवता माघ में संगम स्नान करते हैं। मान्यता है कि प्रयाग में माघ मास में तीन बार स्नान करने का फल दस हजार अश्वमेघ यज्ञ से भी ज्यादा होता है।
आते हैं ये व्रत-त्योहार
माघ माह के दौरान कृष्ण पक्ष में सकट चौथ (गणेश चतुर्थी व्रत) षटतिला एकादशी, लोहड़ी, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या आती है, तो शुक्ल पक्ष में वरदतिलकुन्द-विनायक चतुर्थी, वसंत पंचमी, शीतला षष्ठी, रथ-अचला सप्तमी, जया एकादशी व्रत और माघी पूर्णिमा जैसे पर्व आते हैं। मकर संक्रांति में 14 जनवरी से ही देवों के दिन शुरू होते हैं, उत्तरायण शुरू होता है। गंगापुत्र भीष्म ने अपनी देह का त्याग उत्तरायण में ही किया था।
सूर्य को अर्घ्य और दान भी है खास
पदमपुराण के अनुसार, पूजा, तपस्या, यज्ञ आदि से भी श्री हरि को उतनी प्रसंनता नहीं होती, जितनी कि माघ महीने में प्रातः स्नान कर जगत को प्रकाश देने वाले भगवान सूर्य को अर्घ्य देने से होती है। इसलिए सभी पापों से मुक्ति और भगवान जगदीश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान कर सूर्य मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य को अर्घ्य अवश्य प्रदान करना चाहिए। इस मास में तिल, गुड़ और कंबल के दान का विशेष महत्त्व माना गया है। ऊनी वस्त्र, रजाई, जूता और जो भी शीत निवारक वस्तुएं हैं, उनका दान कर 'माधवः प्रीयताम' यह वाक्य कहना चाहिए। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि माघ मास में जो व्यक्ति ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करता है, उसे ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है।
अमर उजाला के खुला पन्ना से साभार