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Shradh 2019 : भगवान राम ने यहां किया था पिता दशरथ का पिंडदान

Wed, 11 Sep 2019 08:24 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क,अमर उजाला
धर्म डेस्क,अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 11 Sep 2019 08:24 AM IST
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gaya pind daan: Lord Ram did Father Dasharatha's Pinddaan in Gaya
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वैदिक परंपरा के अनुसार पितरों का श्रद्धा से श्राद्ध करना उत्कृष्ट कार्य है। पुत्र का जीवन तभी सार्थक है, जब वह जीवित माता-पिता की सेवा करें और उनके मरणोपरांत उनकी मृत्यु-तिथि और पितृपक्ष में उनका विधि-विधान से श्राद्ध कर्म करें।

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अश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के समय को पितृपक्ष कहा जाता है। मान्यता अनुसार पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का सहज उपाय है। हरिद्वार, गंगासागर, कुरुक्षेत्र, चित्रकूट, पुष्कर सहित हर तीर्थ स्थलों में पितरों का श्रद्धापूर्वक श्राद्ध कर्म किया जाता है। लेकिन गया में होने वाले श्राद्ध कर्म की महिमा का गुणगान स्वयं भगवान राम ने किया है। भगवान राम और सीताजी ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।
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गरूड़ पुराण में भी गया का जिक्र आता है। उसमें लिखा भी गया है 'गृहाच्चलितमात्रस्य गयायां गमनं प्रति. स्वर्गारोहणसोपानं पितृणां तु पदे-पदे.' 

इसका अर्थ है गया में श्राद्ध करने के लिए घर से निकलते ही हर एक कदम एक सीढ़ी बन जाता है पितरों के स्वर्गारोहण के लिए। ग्रंथो के अनुसार गया विष्णु भगवान का पावन नगर है। विष्णु-पुराण और वायु-पुराण में भी गया का जिक्र होता है। यह मोक्ष कि भूमि है। विष्णु पुराण में गया में पिंडदान का महत्व बताया गया है। ऐसा करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है और वे स्वर्ग चले जाते हैं। मान्यता है कि विष्णु भगवान यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं। इसे 'पितृ तीर्थ' भी कहा गया है। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गयासुर नामक राक्षस ने कठोर तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके वरदान मांगा था कि उसका शरीर देवताओं के समान पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन करते ही पापों से मुक्त हो जाएं। इस वरदान के बाद उसके दर्शन मात्र से सब पापों से मुक्ति प्राप्त कर लेते और स्वर्गलोक कि प्राप्ति कर लेते। ऐसे में स्वर्ग कि जनसंख्या में काफी इजाफा होने लगा और सब कुछ प्राकर्तिक नियम के विपरीत चलने लगा। धरती में पाप अधिक बढ़ने लगा। इसके निवारण के लिए देवताओं ने यज्ञ के लिए पवित्र स्थान कि मांग गयासुर से करी और गयासुर ने अपना शरीर यज्ञ के लिए दे दिया। गयासुर के लेटते ही उसका शरीर 5 कोस में फैल गया। यही स्थान आगे चलकर गया नाम से विख्यात हो गया।

अंत समय में भी गयासुर के मन से लोगों को पाप मुक्त करने की इच्छा नहीं गई और फिर उसने देवताओं से वरदान मांगा कि यह स्थान लोगों को मुक्ति दिलाता रहे। यहां पर जो भी व्यक्ति किसी का तर्पण करने की इच्छा से पिंडदान करेगा उन्हें मुक्ति अवश्य मिले। गया में पहले विभिन्न नामों की 360 वेदियां थीं, जहां पिंडदान किया जाता था। अब केवल 48 रह गयी है। इन्हीं वेदियों पर पितरों का तर्पण और पिंडदान किया जाता है।

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