कभी इसी गुफा में रहा करते थे भगवान गणेश
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माता पावर्ती और भगवान शिव के पुत्र गणेश जी मंगलकर्ता और ज्ञान एवं बुद्घि के देवता माने जाते हैं। इसलिए जब भी कोई नया काम शुरू किया जाता है तो सबसे पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है।
लेकिन वेदव्यास जी ने जब महाभारत महाकाव्य की रचना शुरू की तब उन्होंने न सिर्फ गणेश जी का स्मरण किया बल्कि गणेश जी को इस बात के लिए भी तैयार कर लिया आप महाभारत खुद अपने हाथ से लिखें।
गणेश जी ने कहा कि मैं महाभारत लिख तो दूंगा लेकिन आप लगातार कथा बताते रहना होगा अगर मेरी लेखनी रुक गई तो मैं लेखन का कार्य छोड़ दूंगा।
इसी गुफा में गणेश जी ने लिखी थी महाभारत
वेदव्यास जी ने कहा ठीक है लेकिन आप बिना सोचे समझे और बिना मुझसे सलाह लिए कुछ भी नहीं लिखेंगे। इस तरह व्यास जी ने गणेश जी को अपनी बातों में उलझा दिया और गणेश जी को पूरी महाभारत कथा एक छोटी सी गुफा में बैठकर लिखना पड़ा।
जहां यह कथा लिखी गई थी वह आज भी अलकनंदा और सरस्वती नदी के संगम तट पर मौजूद है। यह पवित्र स्थान देवभूमि उत्तराखंड में बद्रीनाथ धाम से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर भारतीय सीमा के अंतिम गांव माणा में स्थित है।
इस गुफा के पास में ही एक और गुफा है जिसे व्यास गुफा कहते हैं। इसी गुफा में रहकर वेदव्यास जी ने सभी पुराणों की रचना की थी। व्यास गुफा को बाहर से देखकर ऐसा लगता है मानो कई ग्रंथ एक दूसरे के ऊपर रखे हुए हैं। इसलिए इसे व्यास पोथी भी कहते हैं।
व्यास गुफा के पास और भी है दर्शनीय स्थल
बद्रीनाथ के दर्शनों के बाद जो यात्री गणेश गुफा और व्यास गुफा की यात्रा करना चाहते हैं वह तीन किलोमीटर की पैदल यात्रा भी कर सकते हैं। रास्ते में साथ चलते अलकनंदा नदी को देखना मन को आनंदित करता है। जो यात्री पैदल नहीं चलना चाहते हैं वह बद्रीनाथ से माणा गांव तक के लिए सवारी ले सकते हैं।
यहां कार और जीप की सुविधा हमेशा उपलब्ध रहती है। व्यास गुफा के पास ही सरस्वती नदी का उद्गम और भीम द्वारा सरस्वती नदी को पार करने के लिए रखा गया बड़ा का चट्टान जिसे भीम पुल भी कहते हैं दर्शनीय है।