पुण्यतिथि विशेष: एक शाश्वत विद्रोही संन्यासी-दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती
आज 26 जून है। स्वामी सहजानंद सरस्वती की पुण्यतिथि। ठीक सत्तर साल पहले आज के दिन ही बिहार के मुजफ्फरपुर में स्वामी जी अपनी नश्वर काया को त्याग महाप्रयाण कर गए थे। स्वामी सहजानंद के रूप में हम एक ऐसे युगपुरुष संन्यासी को याद कर रहे हैं, जिसने अपना जीवन देश की आजादी और किसानों की भलाई के लिए होम कर दिया। परमार्थ चिंतन के परंपरागत मूल्यों से एकाकार होते हुए उन्होंने उस समाज में भगवान का दर्शन किया, जिसे हम किसान कहते हैं।
किसानों के भगवान कहे जाने वाले युगद्रष्टा, जननायक दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती आजीवन त्याग और संघर्ष की प्रतिमूर्ति बने रहे। सब मानते हैं कि भारत की संस्कृति ऋषि और कृषि प्रधान रही है। इस देश का मानस इन दो तत्वों से ही बना है।
संयोगवश स्वामी जी उस भावभूमि से आते हैं, जहां इन दोनों तत्वों की प्रधानता रही। गंगा-यमुना का मैदानी भाग जितना खेती के लिए उर्वर रहा है, उतने ही साधु-संतों और तपस्वियों की आस्था, प्रेरणा और साधना का केंद्र भी रहा है। बींसवी सदी के उत्तरार्ध में उसी भाव धारा से स्वामी सहजानंद नामक एक ऐसा अंकुर प्रस्फुटित हुआ, जिसने अपनी छटा से दिग्-दिगंत को आलोकित किया।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के गांव देवा में महाशिवरात्रि के दिन 1889 में उनका जन्म हुआ। किसान बेनी राय के घर। तब कौन जानता था कि बालक नौरंग राय आगे चलकर एक शाश्वत विद्रोही संन्यासी बनेगा। पूर्व जन्म के संस्कारों ने बचपन में सांसारिक मोह-माया से विरक्ति का भाव इतना प्रबल किया कि वे दंडी संन्यासी बन गए।
उनके युवा मन में विद्रोह की पहली चिंगारी तभी फूटी थी जब घर वालों ने जबरन शादी करा दी थी और साल भर के भीतर पत्नी के स्वर्गवास के बाद दोबारा शादी की जुगत में लगे थे। स्वामीजी ने परिवार, रिश्तेदार और समाज की परवाह किए बिना शादी से मना कर दिया और चुपके से भागकर काशी चले गए।
उनका विद्रोही मन दूसरी बार फिर हिलोरें लिया जब कुछ तथाकथित पंडितों ने उनकी संन्यास दीक्षा का विरोध किया। एक दीक्षित संन्यासी का मन धार्मिक कर्मकांडों के नाम पर फैले आडंबर के खिलाफ विद्रोह पर उतारु हो गया। उन्होंने संन्यास की पात्रता को लेकर जारी काशी की परिपाटी को ही बदल दिया। सिद्ध कर दिया कि दंड धारण करने का एकाधिकार केवल एक जाति विशेष को नहीं है।
स्वामीजी ने देखा कि बड़ी संख्या में लघु-सीमांत किसान अपनी ही जाति के जमींदारों के शोषण और दोहन के शिकार हैं....
तत्कालीन समय और परिस्थितियों की मांग को देख गांधीजी के कहने पर 1920 में वे आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। आंदोलन का केंद्र बिहार रहा। बक्सर के सिमरी और गाजीपुर के विश्वम्भरपुर गांव में रहकर उन्होंने आजादी की लौ को गांवों-किसानों तक पहुंचाया।
फिर बिहटा के पास सीताराम आश्रम स्थापित कर असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक में भाग लिया। इस दौरान गाजीपुर, वाराणसी, आजमगढ़, फैजाबाद और लखनऊ जेल उनका ठिकाना बना। कुछ समय पटना के बांकीपुर जेल और लगभग दो साल हजारीबाग केन्द्रीय कारा में सश्रम कारावास की सजा झेली।
लेकिन कारावास के दौरान गांधीजी के सुविधाभोगी चेलों की करतूतों को निकट से देखने और गांधीजी का जमींदारों के प्रति नरम रुख को देख बिदक गये। पटना में गांधीजी से भूकंप राहत के दौरान किसानों को मालगुजारी में राहत दिलाने की बात पर उनकी अनबन हो गयी।
एक झटके में ही आंदोलन से अलग होकर किसानों के लिए जीने और मरने का संकल्प ले लिया। यह सन 1934 की बात है।स्वामीजी का जीवन फिर से करवट लेता है। वे अब किसानों की भलाई औऱ उनको शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए अपने आप को समर्पित कर देते हैं। फिर तो किसान आंदोलन ने जैसा जोर पकड़ा, भारत का इतिहास उसका गवाह है। किसान आंदोलन के दौरान भी कई तरह के कड़वे अनुभवों से उन्हें दो-चार होना पड़ा।
स्वामीजी ने देखा कि बड़ी संख्या में लघु-सीमांत किसान अपनी ही जाति के जमींदारों के शोषण और दोहन के शिकार हैं। उनकी स्थिति गुलामों से भी बदतर है। विद्रोही सहजानंद ने अपनी ही जाति के जमींदारों के खिलाफ ‘लठ’ उठा ली और आर-पार की लड़ाई शुरू कर दी। उन्होंने देशभर में घूम घूमकर किसानों की रैलियां की।
स्वामीजी के नेतृत्व में सन् 1936 से लेकर 1939 तक बिहार में कई लड़ाईयां किसानों ने लड़ीं। इस दौरान जमींदारों और सरकार के साथ उनकी छोटी-मोटी सैकड़ों भिड़न्तें भी हुई। उनमें बड़हिया, रेवड़ा और मझियावां के बकाश्त सत्याग्रह ऐतिहासिक हैं।
इस कारण बिहार के किसान सभा की पूरे देश में प्रसिद्धि हुई। दस्तावेज बताते हैं कि स्वामीजी की किसान सभाओं में जुटने वाली भीड़ तब कांग्रेस की रैलियों से ज्यादा होती थी। किसान सभा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1935 में इसके सदस्यों की संख्या अस्सी हजार थी जो 1938 में बढ़कर दो लाख पचास हजार हो गयी।
कल्पना करिए कि आज स्वामी जी होते तो क्या चुप बैठते...
इतिहास साक्षी है कि सहजानंद सरस्वती ने ही भारत में पहली बार किसानों का संगठित आंदोलन शुरू किया और उसे अखिल भारतीय स्वरुप दिया। कालांतर में वहीं किसान आंदोलन बिहार में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का आधार बना।
स्वामीजी ने नारा दिया था, जो किसान आंदोलन के दौरान चर्चित हुआ-
‘’जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनाएगा।
यह भारतवर्ष उसी का है, अब शासन भी वहीं चलाएगा’’।।
किसान आंदोलन में मन प्राण से जुटे स्वामी सहजानंद की नेताजी सुभाषचंद्र बोस से निकटता रही। दोनों ने साथ मिलकर समझौता विरोधी कई रैलियां की। स्वामीजी फारवॉर्ड ब्लॉक से भी निकट रहे। एक बार जब स्वामीजी की गिरफ्तारी हुई तो नेताजी ने 28 अप्रैल को ऑल इंडिया स्वामी सहजानंद डे घोषित कर दिया।
सीपीआई जैसी वामपंथी पार्टियां भी स्वामीजी को वैचारिक दृष्टि से अपने करीब मानती रही। यह स्वामीजी का प्रभामंडल ही था कि तब के समाजवादी और कांग्रेस के पुराने शीर्ष नेता मसलन, एमजी रंगा, ई एम एस नंबूदरीपाद, पंडित कार्यानंद शर्मा, पंडित यमुनाकार्यी, आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पंडित यदुनंदन शर्मा, पी सुंदरैया, भीष्म साहनी, बाबा नागार्जुन, बंकिमचंद्र मुखर्जी जैसे तब के नामी चेहरे किसान सभा से जुड़े थे।
स्वामी जी उस दौर में असहमतियों की आवाज थे। जहां भी गलत देखा तुरंत विद्रोह पर उतारु हो गये। परिणाम की चिंता नहीं की। आज का समय दूसरा है। अब असहमति को विरोध के तौर पर तो देखा जाता है। लेकिन विद्रोह कहीं दिखता नहीं।
समय ने ऐसा सुविधाभोगी समाज खड़ा कर दिया है, जहां विचारों-सिद्धांतों की हर रोज बलि चढ़ती है और हम मूकदर्शक बने निहार रहे हैं। व्यक्तिगत लाभ-हानि की चिंता से आतुर समाज के सामने स्वामी सहजानंद एक दीप-स्तंभ की तरह हैं, लेकिन हम उनसे रौशनी लेने को तैयार नहीं हैं। हम जयंती और पुण्यतिथि की औपचारिकता निभाकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। सवाल है कि क्या हम स्वामीजी के अनुयायी कहलाने के हकदार हैं। ये आत्मचिंतन का विषय है।
आज देश में किसानों की जो स्थिति है, यह किसी से छिपी हुई नहीं है। किसानी का धंधा घाटे का सौदा हो गया है। कल्पना करिए कि आज स्वामी जी होते तो क्या चुप बैठते? नहीं, वे सत्ता में बैठे हुक्मरानों की नींद हराम कर दिये होते। उनके जीते-जी किसानों की ये स्थिति नहीं होती।
अब तो देश में कहीं भी किसान आंदोलन की गूंज सुनाई नहीं पड़ती। कहीं छोटे-मोटे आंदोलन होते हैं तो वे भी खाद-बीज, समर्थन मूल्य और कहीं-कहीं भूमि अधिग्रहण जैसे सवालों के इर्द-गिर्द सिमटे रहते हैं। सच पूछिए तो स्वामीजी के महाप्रयाण करने के साथ ही न केवल संगठित किसान आंदोलन का सूरज अस्त हुआ बल्कि उनका सबसे बड़ा रहनुमा भी चला गया, जो किसानों को केवल हक नहीं, बल्कि उनके हाथों में शासन की बागडोर सौंपने का हिमायती था।