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जानें अपने अंत समय के लिए कबीर ने काशी को छोड़ क्यों चुना मगहर?
Mon, 17 Jun 2019 10:30 AM IST
Madhukar Mishra
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: Madhukar Mishra
Updated Mon, 17 Jun 2019 10:30 AM IST
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संत कबीर दास
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भारत की भूमि पर जन्म लेने वाले महापुरुषों में संत कबीर का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। जिन्होंने समाज में व्याप्त तमाम तरह के पाखंड का विरोध करते हुए लोगों को सही दिशा दिखाने का काम किया।
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कबीर की अमृतवाणी
संत कबीर ने अपने पूरे जीवन काल में पाखंड, अंधविश्वास और व्यक्ति पूजा का विरोध करते हुए अपनी अमृतवााणी से लोगों को एकता का पाठ पढ़ाया। आज भी कबीर की वाणी अमृत के समान है, जो व्यक्ति को नया जीवन देने का काम कर रही है। संत कबीर के लोकप्रिय दोहे हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में ले जाने का काम करते हैं।
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काशी छोड़ क्यों गये मगहर
कबीरदास जी ने अपने पूरे जीवनकाल में लोगों के बीच प्रेम, सद्भाव और एकता कायम करने का प्रयास किया। उन्होंने अपनी अमृत वाणी से ही नहीं बल्कि स्वयं का उदाहरण पेश करते हुए लोगों के भ्रम को तोड़ने की कोशिश की थी।
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इस जगह कबीर ने किया देह का त्याग
कबीरदास जी ने स्वर्ग और नर्क को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियों को तोड़ने के लिए एक बड़ी मिसाल पेश की। अपना पूरा जीवन काशी में बिताने वाले संत कबीर दास ने अपने अंतिम समय के लिए एक ऐसे स्थान को चुना, जिसे उन दिनों अंधविश्वास कायम था कि वहां पर मरने से व्यक्ति नरक में जाता है। कबीर दास जी ने लोगों को इस भ्रम को तोड़ने के लिए अपने अंतिम समय में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के पास मगहर चले गए और उन्होंने वहीं पर अपनी देह त्यागी।
तब कुछ ऐसा हुआ था चमत्कार!
कबीरदास जी का जब मगहर में देहावसान हो गया तो उनके हिंदू और मुस्लिम भक्तों में उनके शव के अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हो गया। कहते हैं कि उस समय जब उनके मृत शरीर से चादर हटाई गई तो वहां पर लोगों को सिर्फ फूलों का ढेर पड़ा मिला। जिसके बाद आधे फूल से हिंदुओं ने अपनी रीति-रिवाज के मुताबिक और मुस्लिम ने अपनी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार किया।
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