Yogini Ekadashi 2025: योगिनी एकादशी पर ऐसे करें भगवान विष्णु को प्रसन्न, हर काम में मिलेगी सफलता
Yogini Ekadashi 2025: आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर योगिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस साल यह तिथि 21 जून 2025 को सुबह 07 बजकर 18 मिनट पर शुरू हो रही है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
Yogini Ekadashi 2025: आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर योगिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस साल यह तिथि 21 जून 2025 को सुबह 07 बजकर 18 मिनट पर शुरू हो रही है। इसका समापन 22 जून को सुबह 04 बजकर 27 मिनट पर है। उदया तिथि के अनुसार 21 जून 2025 को योगिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन श्रीहरि की पूजा और उपवास रखने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोज कराने के बराबर फल मिलता है। इसके अलावा मां लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती हैं। इस बार योगिनी एकादशी पर अश्विनी नक्षत्र और अतिगण्ड का योग बना हुआ है। ऐसे में भगवान विष्णु की चालीसा का पाठ करना और भी लाभकारी हो सकता है। इससे जीवन में सुख-समृद्धि और लंबे समय से अटके कार्यों को गति मिल सकती हैं। आइए इस चालीसा के बारे में जानते हैं।
विष्णु चालीसा
दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥
चौपाई
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥
आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥
वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥
असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥
देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥