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Vijaya Ekadashi 2025: विजया एकादशी पर करें विष्णु चालीसा का पाठ, सभी संकट होंगे दूर

Wed, 19 Feb 2025 03:43 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Wed, 19 Feb 2025 03:43 PM IST
सार

Vijaya Ekadashi 2025: हर साल फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पर विजया एकादशी का व्रत रखा जाता है और इस साल 24 फरवरी 2025 को विजया एकादशी मनाई जाएगी।

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Vijaya Ekadashi 2025 date and importance know vishnu chalisa benefits in hindi
Vijaya Ekadashi 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Vijaya Ekadashi 2025: हर साल फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पर विजया एकादशी का व्रत रखा जाता है और इस साल 24 फरवरी 2025 को विजया एकादशी मनाई जाएगी। मान्यता है कि यदि इस तिथि पर सच्चे भाव से भगवान विष्णु की पूजा और उपवास किया जाए, तो व्यक्ति के सभी कष्टों का निवारण होता है, और धन की देवी माता लक्ष्मी भी प्रसन्न होती है। हिंदू धर्म में विजया एकादशी को पाप, ग्रह दोष, शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति पाने का अवसर माना जाता है।

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कहते हैं कि प्रभु श्री राम ने भी विजया एकादशी का व्रत किया था, जिसके शुभ प्रभाव से उन्हें रावण के साथ हुए युद्ध में जीत मिली थी। ज्योतिषियों की मानें तो इस साल विजया एकादशी पर कई शुभ योग बन रहे हैं, जिसमें विष्णु जी की आराधना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। बता दें एकादशी तिथि पर पूर्वाषाढा नक्षत्र और सिद्ध योग बन रहा है जो सुबह 10:04 मिनट तक है। इस योग में पूजा के साथ-साथ विष्णु चालीसा का भी पाठ करें। इससे सभी तरह के संकट दूर होते हैं और घर में भी खुशियों का आगमन होता है। ऐसे में आइए चालीसा के बारे में जानते हैं।

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विष्णु चालीसा

दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥

चौपाई 
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥

शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥

आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥

वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥

असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥

देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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