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Skand Shashti: कब है पौष माह में स्कंद षष्ठी व्रत, जानें साल 2021 में स्कंद षष्ठी व्रत की तिथियां

Fri, 15 Jan 2021 12:12 AM IST
रुस्तम राणा ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रुस्तम राणा Updated Fri, 15 Jan 2021 12:12 AM IST
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Skand Shashti 2021 January date vrat vidhi and Skand Shashti 2021 list
स्कंद षष्ठी 2021 - फोटो : pinterest

Skand Shashti 2021 January: स्कंद षष्ठी व्रत 18 को पड़ रहा है। यह व्रत भगवान कार्तिकेय के लिए रखा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार स्कंद षष्ठी का व्रत हर महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन रखा जाता है। इसलिए पौष शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यह व्रत रखा जाएगा। दक्षिण भारत के राज्यों में स्कंद षष्ठी व्रत बेहद लोकप्रिय है। भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र हैं। 

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स्कंद षष्ठी तिथि 2021

स्कन्द षष्ठी - जनवरी 18, 2021, सोमवार
स्कन्द षष्ठी - फरवरी 17, 2021, बुधवार
स्कन्द षष्ठी - मार्च 19, 2021, शुक्रवार
स्कन्द षष्ठी - अप्रैल 18, 2021, रविवार
स्कन्द षष्ठी - मई 17, 2021, सोमवार
स्कन्द षष्ठी - जून 16, 2021, बुधवार
स्कन्द षष्ठी - जुलाई 15, 2021, बृहस्पतिवार
स्कन्द षष्ठी - अगस्त 13, 2021, शुक्रवार
स्कन्द षष्ठी - सितम्बर 12, 2021, रविवार
स्कन्द षष्ठी - अक्टूबर 11, 2021, सोमवार
स्कन्द षष्ठी - नवम्बर 09, 2021, मंगलवार
स्कन्द षष्ठी - दिसम्बर 09, 2021, बृहस्पतिवार

स्कंद षष्ठी व्रत विधि

  • सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें। 
  • इसके बाद स्नान-ध्यान कर सर्वप्रथम व्रत का संकल्प लें। 
  • पूजा घर में मां गौरी और शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित करें। 
  • पूजा जल, मौसमी फल, फूल, मेवा, कलावा, दीपक, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूध, गाय का घी, इत्र आदि से करें। 
  • अंत में आरती करें। 
  • वहीं शाम को कीर्तन-भजन पूजा के बाद आरती करें। 
  • इसके पश्चात फलाहार करें।

 

स्कंद षष्ठी का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। इनकी पूजा से जीवन में हर तरह की कठिनाइंया दूर होती हैं और व्रत रखने वालों को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान के कष्टों को कम करने और उसके सुख की कामना से ये व्रत किया जाता है। हालांकि यह त्योहार दक्षिण भारत में प्रमुख रूप से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है। उनका प्रिय पुष्प चंपा है। इसलिए इस व्रत को चंपा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया था।

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ऐसे हुआ था भगवान कार्तिकेय का जन्म

कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे। 

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इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे। 


उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।

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