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Sawan Shivratri : प्रकृति भी करती है भगवान शिव का जलाभिषेक

Thu, 09 Aug 2018 11:04 AM IST
डॉ. प्रणव पण्ड्या, कुलाधिपति, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय
डॉ. प्रणव पण्ड्या, कुलाधिपति, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय Updated Thu, 09 Aug 2018 11:04 AM IST
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shravan shivratri 2018 Nature also offer Jalawishak of Lord Shiva
शास्त्रों में श्रावण मास को महत्त्वपूर्ण मास बताया गया है। इस माह में की गयी शिव की आराधना विशेष पुण्यदायी मानी गई है। श्रावण का तात्पर्य सुनने योग्य होता है। श्रवण का अर्थ सुनना है तो श्रावण का अर्थ सुने जाने योग्य होगा। सुना क्या जाना चाहिए? वेद ज्ञान की बातें। इसे सुनने के कारण ही इसका नाम श्रुति पड़ा है। आषाढ़ पूर्णिमा के बाद श्रावण की शुरूआत होती है। आषाढ़ पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरुपूर्णिमा में गुरु से दीक्षा ली जाती है। शिष्य को दीक्षा देकर गुरु उन्हें आत्मकल्याणकारी वेद-ज्ञान का उपदेश देते हैं और शिष्यों से उनका नियमित श्रवण, पठन, चिन्तन-मनन व उनके अनुसार आचरण की आज्ञा देते हैं। गुरु से प्राप्त वेदज्ञान का श्रवण श्रावण से ही शुरू होता है। अर्थात् कल्याणकारी यात्रा का शुभारम्भ होता है श्रावण से। यानि प्राप्त गुरुज्ञान का श्रवण के साथ आचरण शिष्यों का शिव अर्थात् कल्याण करने वाला होता है। इसीलिए भी श्रावण महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
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शिव है कल्याण के देवता

शिवजी को शुभ और कल्याण का देवता माना गया है। श्रावण में शिवजी का महाभिषेक करने का फल अनन्त गुना बताया गया है। इस समय स्वयं प्रकृति देवी भी अपनी रिमझिम बारिश की बून्दों से महाकाल महारुद्र का महारुद्राभिषेक करती नजर आती है। मनुष्य यदि निष्ठापूर्वक शिव-आराधना करे तो उसे कई तरह के लाभ होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।
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असाध्य को साध्य बनाता है श्रावण माह

शिव की साधना-अराधना का पूरे साल असीम पुण्यलाभ मिलता है लेकिन आस्थावान, विवेकी एवं विचारशील लोग श्रावण महीने का उपयोग विशेष तप के लिए करते हैं। तपस्वियों एवं साधकों का अनुभव है कि इस महीने तप करके असाध्य को साध्य बनाया जा सकता है।
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पूर्व जन्म के पापों का होता है शमन

गुरुपूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा तक का प्रत्येक दिन साधना के लिए विलक्षण मुहूर्त है। इसे किसी भी तरह नहीं गँवाना चाहिए। श्रावण मास में की गई शिव साधना से दुष्कर प्रारब्ध एवं संचित कुसंस्कारों का दहन-शमन होता है। जिनके भीतर इसे करने के लिए अपेक्षित शारीरिक सामथ्र्य एवं मनोबल हो, उन्हें इस पवित्र मास में यह साधना-पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए।
 
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रूद्र के मंत्रों से कट जाते हैं सभी दु:ख
श्रावण मास के साथ रुद्राष्टाध्यायी का विज्ञान-विधान भी जुड़ा हुआ है। सभी वेदवेत्ता एवं भगवान शिव के उपासक रुद्राष्टाध्यायी की महिमा एवं महत्त्व से परिचित हैं। यह रुद्राष्टाध्यायी सभी अर्थों में अपूर्व है। इसमें वेदों के, विशेष रूप से यजुर्वेद के बड़े ही चमत्कारी मंत्र संकलित हैं। इस रुद्राष्टाध्यायी का पाँचवाँ अध्याय तो इसका प्राण है। जिन्हें वेदमंत्रों की चमत्कारी सामथ्र्य की अनुभूति करनी हो, वे मात्र शतरुद्रीय या रुद्राष्टाध्यायी का प्रयोग इस श्रावण महीने में कर सकते हैं। भगवान सदाशिव पर अभिषेक की जलधाराओं के साथ शतरुद्रीय या रुद्राष्टाध्यायी का पाठ-अनुभव सर्वविध अलौकिक है। इसके साथ ही यदि गायत्री-साधना एवं चांद्रायण का सुयोग जुड़ सके, तो जीवन के सभी दु:खों एवं दुर्भाग्य का नाश निश्चित है। गायत्री एवं रुद्राष्टाध्यायी की सम्मिलित प्रक्रिया अध्यात्म का ऐसा अकाट्य प्रयोग है, जिसके सुखद परिणाम आने सुनिश्चित हैं। बस यह सब विधिपूर्वक तथा श्रद्धा निष्ठा से होना चाहिए।


मंगल कामनाओं का मास
श्रावण की अमावस्या में शिवोपासना का अर्थ है अपने अन्दर के अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करने का सत्प्रयत्न। इसी तरह इसी पावन माह के अंत में रक्षा बन्धन भी आता है जिसमें भाई बहिन से रक्षासूत्र बँधवाकर उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। बहिन से रक्षासूत्र बँधवाते समय भाई के अन्त:करण में एक शिवसंकल्प उभरता है जो भाई-बहिन दोनों के लिए शुभकारी होता है। इस दृष्टि से भी श्रावण कल्याणकारी हुआ।
 

shravan shivratri 2018 Nature also offer Jalawishak of Lord Shiva

इस माह में सभी शिवभक्तों को शिवाराधन के साथ अपने चिन्तन-मनन व आचरण में शिवतत्त्वों को समाविष्ट करने का प्रयास करना चाहिए। बोलबम् के साथ अपने गुण, कर्मों और स्वभावों में शिवतत्त्वों यानि कल्याणकारी विचारों का ऐसा समावेश करना चाहिए जिससे समूचा जीवन ही शिवमय हो जाए, धन्य बन जाए और श्रावण का व्रताराधन व कावड़ की शिवभावमयी तीर्थयात्रा सबके लिए शुभ यात्रा बन जाए। यह यात्रा मनुष्य मात्र के तथा राष्ट्र के लिए भी कल्याणकारी रूप में प्रस्तुत हो। श्रावणी अमावस्या में शिवाभिषेक करते समय यह शुभ संकल्प भी लें कि हम कल्याणकारी जीवन यात्रा की ओर आगे बढेंगे।


(लेखक- अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं।

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