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Sheetala Ashtami 2021: शीतला अष्टमी आज, सुखी-आरोग्य जीवन के लिए करें शीतला मां का ध्यान
Sun, 04 Apr 2021 06:55 AM IST
विनोद शुक्ला
अनीता जैन, वास्तुविद
अनीता जैन, वास्तुविद
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sun, 04 Apr 2021 06:55 AM IST
सार
शरीर के निरोगी रहने के लिए भी शीतला अष्टमी का व्रत करना चाहिए।
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शीतलाष्टमी 2021 पूजा विधि
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मां शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को की जाती है। इस वर्ष यह पर्व 4 अप्रैल, रविवार को मनाया जाएगा। दैहिक, दैविक एवं भौतिक कष्टों से निवारण के लिए शास्त्रों में देवी-देवताओं की पूजा करने का विधान अनेक धर्मशास्त्रों में बताया गया है। ऐसा ही एक रूप है भगवती स्वरूपा मां शीतला देवी का जिनकी आराधना अनेक संक्रामक रोगों से मुक्ति प्रदान करती है। शरीर के निरोगी रहने के लिए भी शीतला अष्टमी का व्रत करना चाहिए।
अर्पित किए जाते हैं बासी पकवान-
मां शीतला को एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार किए जाते हैं। अष्टमी के दिन बासी पकवान ही देवी को नैवेद्ध के रूप में समर्पित किए जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार आज भी अष्टमी के दिन कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और सभी भक्त ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद के रूप में बासी भोजन का ही आनंद लेते हैं। इसके पीछे मान्यता यह है कि इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है,इसलिए अब यहाँ से आगे हमें बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।
इसलिए धोई जाती हैं आंखें-
शीतला माता के पूजन के बाद उस जल से आँखें धोई जाती हैं। यह परंपरा गर्मियों में आँखों का ध्यान रखने की हिदायत का संकेत है। माता का पूजन करने के बाद हल्दी का तिलक लगाया जाता है,घरों के मुख्यद्वार पर सुख-शांति एवं मंगल कामना हेतु हल्दी के स्वास्तिक बनाए जाते हैं। हल्दी का पीला रंग मन को प्रसन्नता देकर सकारात्मकता को बढ़ाता है, भवन के वास्तु दोषों का निवारण होता है।
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शीतलाष्टक की महिमा-
मां की अर्चना का स्त्रोत स्कंद पुराण में शीतलाष्टक के रूप में मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्त्रोत की रचना स्वयं भगवान शंकर ने जनकल्याण में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा का गान करता है,साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। इस दिन माता को प्रसन्न करने के लिए शीतलाष्टक पढ़ना चाहिए। मां का पौराणिक मंत्र 'हृं श्रीं शीतलायै नमः' भी प्राणियों को सभी संकटों से मुक्ति दिलाते हुए समाज में मान सम्मान दिलाता है। मां के वंदना मंत्र में भाव व्यक्त किया गया है।
स्वच्छता की देवी हैं मां-
शीतला स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। मान्यता है कि नेत्र रोग, ज्वर, चेचक, कुष्ठ रोग, फोड़े-फुंसियां तथा अन्य चर्म रोगों से आहत होने पर मां की आराधना रोगमुक्त कर देती है, यही नहीं माता की आराधना करने वाले भक्त के कुल में भी यदि कोई इन रोगों से पीड़ित हो तो ये रोग-दोष दूर हो जाते हैं। शास्त्रों में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। मां का स्वरूप हाथों में कलश,सूप,मार्जन(झाड़ू) तथा नीम के पत्ते धारण किए हुए चित्रित किया गया है। हाथ में मार्जनी होने का अर्थ है कि हम सभी को सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए।सूप से स्वच्छ भोजन करने की प्रेरणा मिलती है ,क्योंकि ज्यादातर बीमारियां दूषित भोजन करने से ही होती हैं।कलश में सभी तैतीस कोटि देवताओं का वास रहता है अतःइसके स्थापन-पूजन से घर -परिवार में समृद्धि आती है। इन्हीं की कृपा से मनुष्य अपना धर्माचरण कर पाता है बिना शीतला माता की कृपा के देहधर्म संभव नहीं है।इनकी उपासना से जीवन में सुख-शांति मिलती है।
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अर्पित किए जाते हैं बासी पकवान-
मां शीतला को एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार किए जाते हैं। अष्टमी के दिन बासी पकवान ही देवी को नैवेद्ध के रूप में समर्पित किए जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार आज भी अष्टमी के दिन कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और सभी भक्त ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद के रूप में बासी भोजन का ही आनंद लेते हैं। इसके पीछे मान्यता यह है कि इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है,इसलिए अब यहाँ से आगे हमें बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।
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इसलिए धोई जाती हैं आंखें-
शीतला माता के पूजन के बाद उस जल से आँखें धोई जाती हैं। यह परंपरा गर्मियों में आँखों का ध्यान रखने की हिदायत का संकेत है। माता का पूजन करने के बाद हल्दी का तिलक लगाया जाता है,घरों के मुख्यद्वार पर सुख-शांति एवं मंगल कामना हेतु हल्दी के स्वास्तिक बनाए जाते हैं। हल्दी का पीला रंग मन को प्रसन्नता देकर सकारात्मकता को बढ़ाता है, भवन के वास्तु दोषों का निवारण होता है।
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शीतलाष्टक की महिमा-
मां की अर्चना का स्त्रोत स्कंद पुराण में शीतलाष्टक के रूप में मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्त्रोत की रचना स्वयं भगवान शंकर ने जनकल्याण में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा का गान करता है,साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। इस दिन माता को प्रसन्न करने के लिए शीतलाष्टक पढ़ना चाहिए। मां का पौराणिक मंत्र 'हृं श्रीं शीतलायै नमः' भी प्राणियों को सभी संकटों से मुक्ति दिलाते हुए समाज में मान सम्मान दिलाता है। मां के वंदना मंत्र में भाव व्यक्त किया गया है।
स्वच्छता की देवी हैं मां-
शीतला स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। मान्यता है कि नेत्र रोग, ज्वर, चेचक, कुष्ठ रोग, फोड़े-फुंसियां तथा अन्य चर्म रोगों से आहत होने पर मां की आराधना रोगमुक्त कर देती है, यही नहीं माता की आराधना करने वाले भक्त के कुल में भी यदि कोई इन रोगों से पीड़ित हो तो ये रोग-दोष दूर हो जाते हैं। शास्त्रों में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। मां का स्वरूप हाथों में कलश,सूप,मार्जन(झाड़ू) तथा नीम के पत्ते धारण किए हुए चित्रित किया गया है। हाथ में मार्जनी होने का अर्थ है कि हम सभी को सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए।सूप से स्वच्छ भोजन करने की प्रेरणा मिलती है ,क्योंकि ज्यादातर बीमारियां दूषित भोजन करने से ही होती हैं।कलश में सभी तैतीस कोटि देवताओं का वास रहता है अतःइसके स्थापन-पूजन से घर -परिवार में समृद्धि आती है। इन्हीं की कृपा से मनुष्य अपना धर्माचरण कर पाता है बिना शीतला माता की कृपा के देहधर्म संभव नहीं है।इनकी उपासना से जीवन में सुख-शांति मिलती है।