अमावस्या: 10 जुलाई को शनि अमावस्या, तप दान से दूर होते हैं पाप और कष्ट
ज्योतिषीय गणना के अनुसार आत्मा के स्वामी सूर्य और मन के स्वामी चंद्र जब एक ही राशि में आ जाते हैं तो अमावस्या होती है।
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श्राद्ध-तर्पण करके पितरों से आशीर्वाद पाने का दिन शनिवासरी अमावस्या 10 जुलाई, शनिवार को है। आश्विन माह के पितृपक्ष की तरह ही शनिवार अथवा सोमवार को अमावस्या पड़ने पर इस तिथि को श्राद्ध-तर्पण के लिए श्रेष्ठ मानागया है। ये दिन पितृ विसर्जन की तरह ही श्रेष्ठ फलकारक माना गया है। इस दिन संयोगवश शनिवार हो तो यह तिथि अद्भुत पुण्यफल देने में समर्थ हो जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार आत्मा के स्वामी सूर्य और मन के स्वामी चंद्र जब एक ही राशि में आ जाते हैं तो अमावस्या होती है। इस तिथि के दिन प्राणियों में सहज वैराग्य का भाव जागृत होता है क्योंकि, मन और आत्मा के एकाकार होने से चित्त कुछ पलों के लिए निर्मल और एकाग्र हो जाता है। तभी इन तिथियों को साधना के लिए श्रेष्ठ कहा गया है।
सूर्य और चन्द्र के संयोग से ही पूर्णिमा और अमावस्या की तिथियों का निर्धारण होता है। जब ये दोनों ग्रह भ्रमण करते हुए परस्पर 180 अंश की दूरी पर होते हैं तब पूर्णिमा तिथि होती है और एक साथ आ जाते हैं तो
अमावस्या होती है। भगवान शिव ने कृष्णपक्ष से लेकर अमावस्या तक का अधिकार पितरों को एवं शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक का अधिकार देवों को दिया हैं। इसीलिए पितृकार्य से सम्बंधित सभी श्राद्ध-तर्पण आदि कार्य अमावस्या को तक के मध्य किये जाते हैं।
इस महापुण्यदायक तिथि शनिवारी अमावस्या के दिन हमारी वाणी के द्वारा किसी के लिए अशुभ शब्द न निकले इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए, मन, कर्म, तथा वाणी के द्वारा भी किसी के लिए अशुभ नहीं सोचना चाहिए। ये अमावस्या प्राणी को अपना प्रारब्ध सुधारने एवं भाग्य प्रखर करने का सुनहरा अवसर देती है इसलिए अपनी शक्ति-सामर्थ्य के अनुसार इस दिन दान, पुण्य तथा जप करने चाहिए। यदि आप किसी भी तीर्थ, नदी और समुद्र आदि में जाने में किसी भी कारण से असमर्थ हैं तो अपने घर में ही प्रात:काल दैनिक कर्मों से निवृत होकर स्नान अवश्य करें।
झूठ बोलने, छल अथवा कपट आदि करने से बचें। जरूरतमंद विद्यार्थियों को दान में पुस्तकें, भूखों को अन्न- भोजन आदि, गौवों को हरा चारा, कन्यादान हेतु आर्थिक मदद, गरीबों को वस्त्र, तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं अपनी शक्ति-सामर्थ्य के अनुसार दान करें। ऐसा करने से प्राणी को सभी प्रकार के भोगों एवं ऐश्वर्यों की प्राप्ति तो होती ही है। सतयुग में तप से, द्वापर में श्रीहरि की भक्ति से, त्रेता में ब्रह्मज्ञान और कलियुग में दान से मिले हुए पुण्य के बराबर फल शनिवासरी अमावस्या को प्राप्त होता है।