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Hindi News ›   Spirituality ›   Festivals ›   september Pradosh vrat 2024 date puja vidhi and upay for money

Pradosh vrat 2024: सितंबर के आखिरी प्रदोष व्रत पर करें ये पांच उपाय, आर्थिक समस्याओं से मिलेगी मुक्ति

Fri, 27 Sep 2024 07:26 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Fri, 27 Sep 2024 07:26 AM IST
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september Pradosh vrat 2024 date puja vidhi and upay for money
Pradosh vrat 2024 - फोटो : अमर उजाला

Pradosh vrat 2024: आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस बार 29 सितंबर 2024 को प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। ये आश्विन माह का पहला और सितंबर का आखिरी व्रत होगा। इस दिन साध्य योग के साथ मघा नक्षत्र का संयोग बन रहा है। इस योग में महादेव की पूजा करने से मनचाहे परिणामों की प्राप्ति होती हैं।

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हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को महादेव की पूजा के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन वैवाहिक जीवन में खुशहाली के लिए महिलाएं उपवास रखती हैं, जिसका पारण प्रदोष काल में शिव पूजा के बाद किया जाता है। इस दौरान कुछ खास उपाय करने से आर्थिक समस्याओं का निवारण और सुख-समृद्धि का वास होता है। आइए इन उपायों के बारे में जानते हैं।

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प्रदोष व्रत के दिन करें ये 5 उपाय

  • प्रदोष व्रत की पूजा के दौरान शिवलिंग पर जल, तिल और शमी के पत्ते चढ़ाएं। साथ ही शिव चालीसा का पाठ करें। ऐसा करने से सभी समस्याओं का निवारण होता है।
  • प्रदोष व्रत के दिन घर के मुख्य द्वार पर घोड़े की नाल लगानी चाहिए। मान्यता है कि इससे परिवार के सदस्यों को करियर में कामयाबी हासिल होती है। साथ ही घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
  • इस दौरान पूजा में महादेव और देवी पार्वती के सामने घी का दीया जलाएं। इसके बाद उन्हें मिठाई का भोग लगाएं। इससे आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
  • प्रदोष व्रत पर जल में केसर और कुछ फूल डालकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इससे मनचाहे जीवनसाथी की कामना पूरी होती हैं।
  • प्रदोष व्रत पर शिव मंदिर में शिवलिंग पर धतूरा चढ़ाएं। इस दौरान 'ॐ नम: शिवाय' मंत्र का 108 बार जाप करें। इससे शत्रुओं से छुटकारा मिलता है।


शिव चालीसा 

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

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