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Sakat Chauth Vrat Katha: जानिए सकट चौथ व्रत की कथाएं, व्रत से पूरी होंगी हर मनोकामनाएं
Sat, 27 Jan 2024 12:52 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 27 Jan 2024 12:52 PM IST
सार
माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन से गणेश जी के दर्शन का पुण्य फल मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सकट चौथ की यूं तो बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं लेकिन इन दो कथाओं की बहुत मान्यता है
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Sakat Chauth 2024
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
प्रत्येक मास में दो चतुर्थी होती हैं। अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को ''विनायक चतुर्थी '' तथा पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को '' संकष्टी चतुर्थी '' कहते हैं। नारद पुराण के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के व्रत का बहुत महत्त्व है। इस चतुर्थी को'' माघी चौथ '',"सकट चौथ" या ''तिल चौथ '' भी कहा जाता है। गणेश जी की कृपा पाने के लिए वैसे तो कोई भी इस व्रत को कर सकता है , लेकिन अधिकांश सुहागिन स्त्रियां ही इस व्रत को परिवार की सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। इस दिन भगवान गणपति की आराधना से सुख-सौभाग्य में वृद्धि तथा घर-परिवार पर आ रही विघ्न-बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इस दिन श्री गणेश जी की पूजा -अर्चना से रुके हुए मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं। माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन से गणेश जी के दर्शन का पुण्य फल मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सकट चौथ की यूं तो बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं लेकिन इन दो कथाओं की बहुत मान्यता है,आइए जानते हैं-
कथा-1
त्रेता युग में रावण ने स्वर्ग के सभी देवताओं को जीतकर अंगद के पिता बाली को पीछे से जाकर पकड़ लिया। वानरराज बाली रावण को अपनी बगल (कांख) में दबाकर किष्किन्धा नगरी ले आये और अपने पुत्र अंगद को खेलने के लिए खिलौना दे दिया। अंगद रावण को खिलौना समझकर रस्सी से बांधकर इधर उधर घुमाते थे।इससे रावण को बहुत कष्ट और दु:ख प्राप्त हुआ। रावण ने दु:खी मन से अपने पितामह पुलस्त्य जी को याद किया। रावण की इस दशा को देखकर पुलस्त्य ने विचारा कि उसकी यह दशा क्यों हुई ? अभिमान हो जाने पर देव, मनुष्य, असुर, सभी की यही गति होती है। पुलस्त्य ऋषि ने रावण से पूछा तुमने मुझे क्यों याद किया है ? रावण बोला- पितामह मैं बहुत दु:खी हूँ, यह नगरवासी मुझे धिक्कारते हैं अब आप मेरी रक्षा करें। रावण के ऐसे वचनों को सुनकर पुलस्त्य बोले – पुत्र तुम डरों नहीं तुम इस बन्धन से जल्दी मुक्त होगे।पुलस्त्य ने कहा कि तुम विघ्नविनाशक गणेशजी का स्मरण करके व्रत करो। पूर्वकाल में वृत्रासुर की हत्या से छुटकारा पाने के लिए इंद्र ने इस व्रत को किया था। इसलिए तुम भी इस व्रत को करो। रावण ने भक्तिपूर्वक इस व्रत को किया और बाली के बन्धन से मुक्त होकर पुनः अपने राज्य को प्राप्त किया।
कथा-2
पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार देवों के देव महादेव ने शिवजी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने कहा कि तुम दोनों में से जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करकेआएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। ये वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परन्तु गणेश जी विचारमग्न हो गए कि वे चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। वे अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की सात परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजयी बताया। शिवजी ने गणेशजी से पृथ्वी की परिक्रमा न करने का कारण पूछा। तब गणेश जी ने कहा -'माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं '। यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी और गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा श्रद्धा पूर्वक पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।
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कथा-1
त्रेता युग में रावण ने स्वर्ग के सभी देवताओं को जीतकर अंगद के पिता बाली को पीछे से जाकर पकड़ लिया। वानरराज बाली रावण को अपनी बगल (कांख) में दबाकर किष्किन्धा नगरी ले आये और अपने पुत्र अंगद को खेलने के लिए खिलौना दे दिया। अंगद रावण को खिलौना समझकर रस्सी से बांधकर इधर उधर घुमाते थे।इससे रावण को बहुत कष्ट और दु:ख प्राप्त हुआ। रावण ने दु:खी मन से अपने पितामह पुलस्त्य जी को याद किया। रावण की इस दशा को देखकर पुलस्त्य ने विचारा कि उसकी यह दशा क्यों हुई ? अभिमान हो जाने पर देव, मनुष्य, असुर, सभी की यही गति होती है। पुलस्त्य ऋषि ने रावण से पूछा तुमने मुझे क्यों याद किया है ? रावण बोला- पितामह मैं बहुत दु:खी हूँ, यह नगरवासी मुझे धिक्कारते हैं अब आप मेरी रक्षा करें। रावण के ऐसे वचनों को सुनकर पुलस्त्य बोले – पुत्र तुम डरों नहीं तुम इस बन्धन से जल्दी मुक्त होगे।पुलस्त्य ने कहा कि तुम विघ्नविनाशक गणेशजी का स्मरण करके व्रत करो। पूर्वकाल में वृत्रासुर की हत्या से छुटकारा पाने के लिए इंद्र ने इस व्रत को किया था। इसलिए तुम भी इस व्रत को करो। रावण ने भक्तिपूर्वक इस व्रत को किया और बाली के बन्धन से मुक्त होकर पुनः अपने राज्य को प्राप्त किया।
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कथा-2
पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार देवों के देव महादेव ने शिवजी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने कहा कि तुम दोनों में से जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करकेआएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। ये वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परन्तु गणेश जी विचारमग्न हो गए कि वे चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। वे अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की सात परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजयी बताया। शिवजी ने गणेशजी से पृथ्वी की परिक्रमा न करने का कारण पूछा। तब गणेश जी ने कहा -'माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं '। यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी और गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा श्रद्धा पूर्वक पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।
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