धार्मिक ही नहीं, नवरात्र में व्रत, पूजन और हवन के ये भी हैं कारण
- देवी भागवत् पुराण के अनुसार पूरे वर्ष में चार नवरात्र होते हैं
- कलियुग में शारदीय नवरात्र का महत्व अधिक रहता है
- चैत्र नवरात्र के पहले दिन आदिशक्ति प्रकट हुई थी
- चैत्र नवरात्र से नववर्ष के पंचांग की गणना शुरू होती है
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आप नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा और व्रत करते हैं लेकिन इसके पीछे क्या सिर्फ आपकी आस्था है या कुछ और भी है। दरअसल नवरात्र के मौके पर पूजन और व्रत का विधान सदियों से चला आ रहा है जिसके पीछे कई रहस्य छिपे हैं। आइये आज इन्हीं रहस्यों पर से पर्दा उठाते हैं और जानते हैं कि नवरात्र के दिनों में देवी की पूजा, व्रत और हवन के पीछे कौन सा रहस्य छुपा है।
अाध्यात्मिक कारणः चैत्र नवरात्र सबसे खास इसलिए
त्रेता युग में आषाढ़ नवरात्र अधिक महत्वपूर्ण रहता है जबकि द्वापर युग में माघ के नवरात्र का विशेष महत्व है। चैत्र नवरात्र का महत्व आज शारदीय नवरात्र से कम दिखता है जबकि सतयुग में चैत्र नवरात्र ही सबसे महत्वपूर्ण रहता है। नवरात्र का महत्व समय और परिस्थिति के अनुसार बदलता है। शारदीय नवरात्र वैभव और भोग प्रदान देने वाले है। गुप्तनवरात्र तंत्र सिद्धि के लिए विशेष है जबकि चैत्र नवरात्र आत्मशुद्धि और मुक्ति के लिए। वैसे सभी नवरात्र का आध्यात्मिक दृष्टि से अपना महत्व है।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह प्रकृति और पुरुष के संयोग का भी समय होता है। प्रकृति मातृशक्ति होती है इसलिए इस दौरान देवी की पूजा होती है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि संपूर्ण सृष्टि प्रकृतिमय है और वह सिर्फ पुरुष हैं। यानी हम जिसे पुरुष रूप में देखते हैं वह भी आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकृति यानी स्त्री रूप है। स्त्री से यहां मतलब यह है कि जो पाने की इच्छा रखने वाला है वह स्त्री है और जो इच्छा की पूर्ति करता है वह पुरुष है।
नवरात्र के नौ दिनों में मनुष्य अपनी भौतिक, आध्यात्मिक, यांत्रिक और तांत्रिक इच्छाओं को पूर्ण करने की कामना से व्रतोपवास रखता है और ईश्वरीय शक्ति इन इच्छाओं को पूर्ण करने में सहायक होती है। इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि से नवरात्र का अपना महत्व है।
चैव नवरात्र का धार्मिक महत्व
धार्मिक दृष्टि से नवरात्र का अपना अलग ही महत्व है क्योंकि इस समय आदिशक्ति जिन्होंने इस पूरी सृष्टि को अपनी माया से ढ़का हुआ है जिनकी शक्ति से सृष्टि का संचलन हो रहा है जो भोग और मोक्ष देने वाली देवी हैं वह पृथ्वी पर होती है इसलिए इनकी पूजा और आराधना से इच्छित फल की प्राप्ति अन्य दिनों की अपेक्षा जल्दी होती है।
जहां तक बात है चैत्र नवरात्र की तो धार्मिक दृष्टि से इसका खास महत्व है क्योंकि चैत्र नवरात्र के पहले दिन आदिशक्ति प्रकट हुई थी और देवी के कहने पर ब्रह्मा जी को सृष्टि निर्माण का काम शुरु किया था।
इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष शुरु होता है। चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में पहला अवतार लेकर पृथ्वी की स्थापना की थी। इसके बाद भगवान विष्णु का सातवां अवतार जो भगवान राम का है वह भी चैत्र नवरात्र में हुआ था। इसलिए धार्मिक दृष्टि से चैत्र नवरात्र का बहुत महत्व है।
ज्योतिषीय महत्वः चैत्र नवरात्र में नवग्रहों की पूजा इसलिए होती है
ज्योतिष की दृष्टि से चैत्र नवरात्र का विशेष महत्व है क्योंकि इस नवरात्र के दौरान सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। सूर्य 12 राशियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फिर से अगला चक्र पूरा करने के लिए पहली राशि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य और मंगल की राशि मेष दोनों ही अग्नि तत्व वाले हैं इसलिए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है।
चैत्र नवरात्र से नववर्ष के पंचांग की गणना शुरू होती है। इसी दिन से वर्ष के राजा, मंत्री, सेनापति, वर्षा, कृषि के स्वामी ग्रह का निर्धारण होता है और वर्ष में अन्न, धन, व्यापार और सुख शांति का आंकलन किया जाता है। नवरात्र में देवी और नवग्रहों की पूजा का कारण यह भी है कि ग्रहों की स्थिति पूरे वर्ष अनुकूल रहे और जीवन में खुशहाली बनी रहे।
वैज्ञानिक कारणः नवरात्र में व्रत और हवन इसलिए होता है
नवरात्र का महत्व सिर्फ धर्म, अध्यात्म और ज्योतिष की दृष्टि से ही नहीं है बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवरात्र का अपना महत्व है। हमारे ऋषि मुनियों ने न सिर्फ धार्मिक दृष्टि को ध्यान में रखकर नवरात्र में व्रत और हवन पूजन करने के लिए कहा है बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार भी है।
पाश्चात्य शोधकर्ताओं ने नवरात्र में व्रत के कारणों का अध्ययन किया है और पाया है कि नवरात्र के दौरान व्रत और हवन पूजन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही बढ़िया है। इसका कारण यह है कि चारों नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल में होते हैं यानी इस समय मौसम में बदलाव होता है जिससे शारीरिक और मानसिक बल की कमी आती है। शरीर और मन को पुष्ट और स्वस्थ बनाकर नए मौसम के लिए तैयार करने के लिए व्रत किया जाता है।
ऋतु बदलने के लिए समय रोग जिन्हें आसुरी शक्ति कहते हैं उनका अंत करने के लिए हवन, पूजन किया जाता है जिसमें कई तरह की जड़ी, बूटियों और वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता है।