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Pitru Paksha 2024: श्राद्ध करने से पूर्वजों का मिलता है आशीर्वाद, इन बातों का रखें ध्यान

Fri, 20 Sep 2024 03:14 PM IST
मेघा कुमारी पं. निश्चल शास्त्री, धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
पं. निश्चल शास्त्री, धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Fri, 20 Sep 2024 03:14 PM IST
सार

 व्यक्ति का अंत समय कैसा रहा, इस आधार पर उसकी श्राद्ध विधि भी विशेष हो जाती है। अलग-अलग मृत्यु स्थितियों के लिए अलग-अलग तरह से पिंडदान का विधान है

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Pitru Paksha 2024 tithi and shradh niyam in hindi
Pitru Paksha 2024 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Pitru Paksha 2024: ‘पिंड’ शब्द का अर्थ होता है ‘किसी वस्तु का गोलाकार रूप’। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। मृतक कर्म के संदर्भ में ये दोनों ही अर्थ संगत होते हैं, अर्थात इसमें मृतक के निमित्त अर्पित किए जाने वाले पदार्थ, जिसमें जौ या चावल को मसलकर तैयार किया गया गोलाकृतिक ‘पिंड’ होता है। अलग-अलग मृत्यु स्थितियों के लिए अलग-अलग पिंडदान किया जाता है। महालया या पितृपक्ष में सामान्यतया जिस पूर्वज की जिस तिथि को मृत्यु हुई हो, उसका श्राद्ध पितृपक्ष की उस तिथि को किया जाता है। लेकिन इस विषय में कुछ अपवाद हैं, जिनका सदैव पालन करना चाहिए।

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पिंडदान के अलग-अलग विधान

  • सधवा स्त्री की मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो, लेकिन पितृपक्ष में उसका श्राद्ध नवमी को ही करना चाहिए। यही धर्म संगत है।
  • यदि कोई पूर्वज अपने जीवन में सन्यासी या वनवासी हो गया हो, तो उसकी मृत्यु के बाद उसका श्राद्ध मृत्यु तिथि को न होकर द्वादशी को ही होता है।
  • किसी जीव-जंतु के काटने, शस्त्र या विष से अथवा हत्या या दुर्घटना में मरे हुए व्यक्ति का श्राद्ध उसकी मृत्यु तिथि को न होकर पितृपक्ष की चतुर्दशी को करें।
  • जिस पूर्वज की मृत्यु तिथि का पता न हो या जिसका श्राद्ध किसी कारणवश छूट गया हो, उसका श्राद्ध पितृपक्ष की अमवस्या को करें।


कुछ बातों का खास ख्याल

  • वैदिक दर्शन के अनुसार, श्राद्ध का सबसे मुख्य तत्व श्रद्धा है, जो प्रेम और विश्वास के साथ समर्पण के भाव में दिखाई देती है। श्रद्धा के बिना कराया गया भोजन और दान श्राद्ध नहीं कहलाता है, क्योंकि श्रद्धाविहीन कर्म से न तो पितर संतुष्ट होते हैं और न ही कर्त्ता को संतुष्टि मिलती है। इसलिए श्राद्ध करने वाले जातक को इस बात का खास ख्याल रखना बहुत जरूरी है।
  • तर्पण, दान और होम में दिया गया तिल का दान अक्षय होता है।
  • कुश के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में शिव का वास होता है, इसलिए श्राद्ध-कर्म में कुश को सबसे जरूरी माना गया है।
  • कौवे और कुत्ते को यम जीव कहा गया है और गाय को मोक्ष प्रदायिनी, इसलिए इन सबका भी अंशदान किया जाता है।
  • गर्भ में जो बच्चे मर जाते हैं, वे भी पितरों की श्रेणी में ही आते हैं। इसलिए उनका पिंडदान महाकाल के चरणों में ही करना चाहिए।
  • अपनी पूरी उम्र जीने के बाद जो व्यक्ति इस दुनिया से विदाई लेते हैं, उनका पिंडदान ब्रह्म कपाल में करना चाहिए।
  • अकाल मृत्यु को प्राप्त होने वाले पितरों का श्राद्ध जगन्नाथपुरी में किया जाना चाहिए।
  • बीमारी से मृत्यु को प्राप्त होने वाले पितरों का श्राद्ध और पिंडदान ओंकारेश्वर में किया जाना चाहिए।
  • जिनका वंश आगे नहीं बढ़ता और वे अकेले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, तो ऐसे पितरों का पिंडदान पशुपतिनाथ या कैलाश मानसरोवर में किया जाना चाहिए।
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