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Pitru Paksha 2023: जानें पितृपक्ष का महत्व और श्राद्ध पक्ष में किस तिथि को किसका करें श्राद्ध
Wed, 27 Sep 2023 02:05 PM IST
विनोद शुक्ला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 27 Sep 2023 02:05 PM IST
सार
सभी सनातन धर्मावलम्बियों को अपने पितरों की कृपा-आशीर्वाद पाने के लिए श्राद्ध पक्ष के मध्य तर्पण- श्राद्ध कर्म आदि अवश्य करने चाहिए।
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पितृ पक्ष 2023
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हर वर्ष पितरों की प्रसन्नता प्राप्ति और दुखों से मुक्ति पाने का पर्व श्राद्ध 16 दिनों तक मनाया जाता है। सभी सनातन धर्मावलम्बियों को अपने पितरों की कृपा-आशीर्वाद पाने के लिए श्राद्ध पक्ष के मध्य तर्पण- श्राद्ध कर्म आदि अवश्य करने चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि 'श्राद्धात परतरं नान्यच्छेयस्कर मुदाहृतम। तस्मात् सर्व प्रयत्नेन श्राद्धं कुर्यात विचक्षणः।।
अर्थात- इस संसार में दैहिक, दैविक, और भौतिक तीनों तापों से मुक्ति पाने के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई अन्य उपाए नहीं है। इसीलिए मनुष्य को यत्न पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। पित्रों के लिए समर्पित माह 'श्राद्धपक्ष' भादौं पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक मनाया जाता है। परमपिता ब्रह्मा ने यह पक्ष पितरों के लिए ही बनाया है। आदिकाल में सुर्यपुत्र यम ने परमेश्वर श्रीशिव की बीस हज़ार वर्ष तक घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर वरदान के रूप में भगवान शिव ने उन्हें पितृलोक का भी अधिकारी बनाया। शास्त्र मत है कि जो प्राणी वर्ष पर्यन्त्र पूजा-पाठ आदि नहीं करते, वे भी अपने पितरों का श्राद्ध-तर्पण करके ईष्ट कार्यसिद्धि और पूण्य प्राप्त कर कर सकते हैं।
श्राद्ध करने की तिथियां
वर्षपर्यंत श्राद्ध करने के छियानबे अवसर आते हैं। ये हैं बारह महीनें की बारह अमावस्या, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के प्रारम्भ की चार तिथियां, मनुवों के आरम्भ की चौदह मन्वादि तिथियां, बारह संक्रांतियां, बारह वैधृति योग, बारह व्यतिपात योग, पंद्रह महालय-श्राद्ध पक्ष की तिथियां, पांच अष्टका पांच अन्वष्टका और पांच पूर्वेद्युह ये श्राद्ध करने छियानबे अवसर हैं।
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श्राद्ध पक्ष का समय आ गया है ऐसा जानकर पितरों को प्रसन्नता होती है। वे परस्पर ऐसा विचार करके उस श्राद्ध में मन के समान तीव्र गति से आ पहुचते हैं। अंतरिक्ष गामी पितृगण श्राद्ध में ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करते हैं, जिन ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन कराया जाता है उन्ही के शरीर में प्रविष्ट होकर पितृगण भी भोजन करते हैं उसके बाद अपने कुल के श्राद्ध करता को आशीर्वाद देकर पितृलोक चले जाते हैं।
किस तिथि को किसका श्राद्ध करें
किसी भी माह की जिस तिथि में परिजन की मृत्यु हुई हो, श्राद्धपक्ष में उसी से संबधित तिथि में श्राद्ध करना उस पितृ का श्राद्ध करना चाहिए। कुछ खास तिथियां भी हैं जिनमें किसी भी प्रकार से मृत हुए परिजन का श्राद्ध किया जाता है। शौभाग्यवती अर्थात पति के रहते ही जिस महिला की मृत्यु हो गयी हो उन नारियों का श्राद्ध नवमी तिथि में किया जाता है। ऐसी स्त्री जो मृत्यु को तो प्राप्त हो चुकी किन्तु उनकी तिथि नहीं पता हो तो उनका भी श्राद्ध मातृनवमी को ही करने का विधान है।
सभी वैष्णव संन्यासियों का श्राद्ध एकादशी में किया जाता है जबकि शस्त्रघात, आत्म हत्या, विष, और दुर्घटना आदि से मृत लोंगों का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है। सर्पदंश, ब्राह्मण श्राप, वज्रघात, अग्नि से जले हुए, दंतप्रहार से, हिंसक पशु के आक्रमण से, फांसी लगाकर मृत्य, कोरोना जैसी महामारी, क्षय रोग, हैजा आदि किसी भी तरह की महामारी से, डाकुओं के मारे जाने से हुई मृत्यु वाले प्राणी श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या के दिन करना चाहिये। जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो उनका भी अमावस्या को ही करना चाहिए।
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अर्थात- इस संसार में दैहिक, दैविक, और भौतिक तीनों तापों से मुक्ति पाने के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई अन्य उपाए नहीं है। इसीलिए मनुष्य को यत्न पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। पित्रों के लिए समर्पित माह 'श्राद्धपक्ष' भादौं पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक मनाया जाता है। परमपिता ब्रह्मा ने यह पक्ष पितरों के लिए ही बनाया है। आदिकाल में सुर्यपुत्र यम ने परमेश्वर श्रीशिव की बीस हज़ार वर्ष तक घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर वरदान के रूप में भगवान शिव ने उन्हें पितृलोक का भी अधिकारी बनाया। शास्त्र मत है कि जो प्राणी वर्ष पर्यन्त्र पूजा-पाठ आदि नहीं करते, वे भी अपने पितरों का श्राद्ध-तर्पण करके ईष्ट कार्यसिद्धि और पूण्य प्राप्त कर कर सकते हैं।
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श्राद्ध करने की तिथियां
वर्षपर्यंत श्राद्ध करने के छियानबे अवसर आते हैं। ये हैं बारह महीनें की बारह अमावस्या, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के प्रारम्भ की चार तिथियां, मनुवों के आरम्भ की चौदह मन्वादि तिथियां, बारह संक्रांतियां, बारह वैधृति योग, बारह व्यतिपात योग, पंद्रह महालय-श्राद्ध पक्ष की तिथियां, पांच अष्टका पांच अन्वष्टका और पांच पूर्वेद्युह ये श्राद्ध करने छियानबे अवसर हैं।
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श्राद्ध पक्ष का समय आ गया है ऐसा जानकर पितरों को प्रसन्नता होती है। वे परस्पर ऐसा विचार करके उस श्राद्ध में मन के समान तीव्र गति से आ पहुचते हैं। अंतरिक्ष गामी पितृगण श्राद्ध में ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करते हैं, जिन ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन कराया जाता है उन्ही के शरीर में प्रविष्ट होकर पितृगण भी भोजन करते हैं उसके बाद अपने कुल के श्राद्ध करता को आशीर्वाद देकर पितृलोक चले जाते हैं।
किस तिथि को किसका श्राद्ध करें
किसी भी माह की जिस तिथि में परिजन की मृत्यु हुई हो, श्राद्धपक्ष में उसी से संबधित तिथि में श्राद्ध करना उस पितृ का श्राद्ध करना चाहिए। कुछ खास तिथियां भी हैं जिनमें किसी भी प्रकार से मृत हुए परिजन का श्राद्ध किया जाता है। शौभाग्यवती अर्थात पति के रहते ही जिस महिला की मृत्यु हो गयी हो उन नारियों का श्राद्ध नवमी तिथि में किया जाता है। ऐसी स्त्री जो मृत्यु को तो प्राप्त हो चुकी किन्तु उनकी तिथि नहीं पता हो तो उनका भी श्राद्ध मातृनवमी को ही करने का विधान है।
सभी वैष्णव संन्यासियों का श्राद्ध एकादशी में किया जाता है जबकि शस्त्रघात, आत्म हत्या, विष, और दुर्घटना आदि से मृत लोंगों का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है। सर्पदंश, ब्राह्मण श्राप, वज्रघात, अग्नि से जले हुए, दंतप्रहार से, हिंसक पशु के आक्रमण से, फांसी लगाकर मृत्य, कोरोना जैसी महामारी, क्षय रोग, हैजा आदि किसी भी तरह की महामारी से, डाकुओं के मारे जाने से हुई मृत्यु वाले प्राणी श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या के दिन करना चाहिये। जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो उनका भी अमावस्या को ही करना चाहिए।