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एकादशी 2020: महर्षि वेदव्यास ने भीम को बताया था निर्जला एकादशी का महत्व

Mon, 01 Jun 2020 07:23 AM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री
पं जयगोविंद शास्त्री Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 01 Jun 2020 07:23 AM IST
सार

  • निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी नाम दिया गया है।
  • एकादशी स्वयं विष्णु प्रिया हैं इसलिए इस दिन जप-तप पूजा पाठ करने से प्राणी श्रीविष्णु का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है।

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nirjala ekadashi 2020 significance and importance of bheemseni ekadashi
निर्जला एकादशी 2020: महर्षि व्यास ने इस निर्जला एकादशी व्रत के महत्व को पांडवों को बताया था।

विस्तार

चौबीस एकादशियों में श्रेष्ठ एवं अक्षुणफल प्रदान करने वाली 'भीमसेनी' एकादशी 2 जून मंगलवार को है। ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की इस एकादशी को अपरा और निर्जला एकादशी नामों से भी जाना जाता है। पद्मपुराण के अनुसार इस एकादशी को निर्जल व्रत रखते हुए परमेश्वर श्रीविष्णु की भक्तिभाव से पूजा-आराधना करने से प्राणी समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त होता है। 

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जब नारदजी ने किया एकादशी व्रत
वतर्मान श्रीश्वेतवाराह कल्प के आरंभ में देवर्षि नारद की 'श्रीविष्णु' के प्रति भक्ति देख ब्रह्मा जी बहुत प्रसन्न हुए। नारद ने आग्रह किया कि हे ! परमपिता मुझे ऐसा कोई मार्ग बतायें जिससे मैं श्री विष्णु के चरणकमलों में स्थान पा सकूं। पुत्र नारद का नारायण प्रेम देख ब्रह्मा जी श्रीविष्णु की प्रिया 'अपरा' तिथि 'एकादशी' को निर्जल व्रत करने का सुझाव दिया। नारद जी प्रसन्नचित्त होकर एक हजार वर्ष तक 'निर्जल' रहकर यह कठोर व्रत किया। कुछ वर्षों बाद तपस्या के मध्य ही उन्हें अपने चारों तरफ उन्हें नारायण ही नारायण दिखने लगे। परमेश्वर की इस माया से वे भ्रम में पड़ गए कि कहीं यही विष्णुलोक तो नहीं ! तभी उन्हें भगवान श्रीविष्णु का दर्शन हुआ, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर नारायण ने उन्हें अपनी निश्छल भक्ति का वरदान देते हुए अपने श्रेष्ठ भक्तों में स्थान दिया। तभी से इस निर्जल व्रत का प्रचलन आरम्भ हुआ। 
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एकादशी का महत्व
एकादशी स्वयं विष्णु प्रिया हैं इसलिए इस दिन जप-तप पूजा पाठ करने से प्राणी श्रीविष्णु का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इस व्रत को 'देवव्रत' भी कहा जाता है क्योंकि सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि अपनी रक्षा और श्रीविष्णु की कृपा पाने के लिए एकादशी का व्रत करते हैं। पौराणिक मान्यता है कि एकादशी में ब्रह्म हत्या सहित समस्त पापों को शमन करने की शक्ति होती है। इस दिन किसी भी तरह का पापकर्म करने से बचने का प्रयास करें, ही साथ ही मांस, मदिरा, तथा अन्य तामसी पदार्थों के सेवन से भी बचना चाहिए।


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वेदव्यास ने भीम को एकादशी व्रत का संकल्प कराया
वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में भगवान के अंशावतार महर्षि व्यास ने इस निर्जला एकादशी व्रत के महत्व को पांडवों को बताया था। इस कथा के पीछे भी एक घटना है-कि जब सर्वज्ञ वेदव्यास पांडवों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो महाबली भीम ने पूछा कि देव ! मेरे पेट में 'वृक' नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाऊँगा ? 

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महर्षि व्यास ने कहा, नहीं वत्स ! तुम ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एकादशी का व्रत करों तो तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। तुम इस लोक में सुख और यश को प्राप्त कर मोक्ष लाभ प्राप्त करोगे। इस सलाह पर भीम भी इस एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए। तभी से वर्ष भर की चौबीस एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को लोक में भीमसेनी एकादशी नाम दिया गया है। इस दिन जो प्राणी स्वयं निर्जल रहकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करता है वह जन्म जन्मांतर के पापों से छुटकारा पाते हुए गोलोक वासी होता है।

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