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Ganga Dussehra 2020 : 1 जून को है गंगा दशहरा, जानिए मां गंगा के जन्म की कहानी

Fri, 29 May 2020 07:50 AM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य
पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य Published by: विनोद शुक्ला Updated Fri, 29 May 2020 07:50 AM IST
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ganga dussehra 2020 know story about ganga birth
Ganga Dussehra 2020: महाभारत में गंगा को वेद-वेदांत विद्या के साथ ही ज्ञान, क्रिया एवं भक्ति का सार तत्व कहा गया है। - फोटो : फाइल फोटो: अमर उजाला
पुराणों-उपनिषदों में गंगा-
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सनातन धर्म में अपौरुषेय वेदों के अतिरिक्त पुराण-उपनिषद आदि ग्रन्थों में भी आकाश, पाताल और मृत्युलोक (त्रिपथगामिनी) विष्णुपदी माँ गंगा को सभी पवित्र नदियों, तीर्थों, सरोवरों और समुद्रों की परम माता माना गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार सत्ययुग में ध्यान के द्वारा, त्रेतायुग में ध्यान और तप के माध्यम से द्वापर में ध्यान, तप तथा यज्ञ के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती थी, परन्तु कलियुग में तो केवल गंगा ही मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। ध्यानं कृते मोक्षहेतु: स्त्रेतायां तच्च वै तपः। द्वापरे तद्द्वयं यज्ञाः कलौ: गङ्गैव केवलम् ।। इसीलिए वेदों-पुराणों में गंगाजल को ब्रह्मजल कहा गया है उसमें सभी भगवतीय गुणों की अवस्थिति भी है जिनके कारण वह अन्य नदियों, जलाशयों से पृथक महत्व रखती हैं।

जिस प्रकार परब्रह्म परमेश्वर सर्वदाशुद्ध, सदापवित्र, निर्विकार हैं, उसी प्रकार गंगाजल भी है इसमें असाध्य रोगों को हरने, जीवन देने और मोक्ष प्राप्ति कराने की क्षमता है। वैदिककाल से ऋषियों ने जलतत्व को सभी कामनाओं का पूरक तथा ब्रह्म के सदृश स्वीकार किया है। स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान् कामान् ।(छान्दोग्य उपनिषत)। महाभारत में गंगा को वेद-वेदांत विद्या के साथ ही ज्ञान, क्रिया एवं भक्ति का सार तत्व कहा गया है। वेदवेदान्तविद्यानां सारभूता ही जाह्नवी। भविष्यपुराण में गंगास्नान के लिए सभी काल एवं सभी स्थान पवित्र माने गए हैं।
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गंगा का प्राकट्य-
गंगा के प्रादुर्भाव का श्रेय परमपिता ब्रह्मा को जाता है क्योंकि आदिकाल में ब्रह्मा जब जी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से निवेदन किया कि हे पराशक्ति ! आप सम्पूर्ण लोकों का आदि कारण बनों, मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि आरम्भ करूँगा। ब्रह्मा जी के निवेदन पर उन मूलप्रकृति ने गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी, ब्रह्मविद्या, उमा, शक्तिबीजा, तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात रूपों में अभिव्यक्त हुईं । इनमें सातवीं 'पराप्रकृति 'धर्मद्रवा' को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित देखकर ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमण्डलु में धारण कर लिया, वामन अवतार में बलि के यज्ञ के समय जब भगवान श्रीविष्णु का एक चरण आकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुआ तब ब्रह्मा ने कमण्डलु के जल से श्रीविष्णु के चरणों की पूजा की। पाँव धुलते समय चरण जल हेमकूट पर्वत पर गिरा, वहाँ से भगवान शंकर के पास पहुँचकर वह जल गंगा के रूप मे उनकी जटा में स्थित हो गया। सातवीं प्रकृति गंगा बहुतकाल तक भगवान शंकर की जटा में ही भ्रमण करती रहीं। इसके बाद सूर्यवंशी राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ ने अपने पूर्वज राजा सागर की दूसरी पत्नी सुमति के साठ हज़ार पुत्रों का विष्णु के अंशावतार कपिल मुनि के श्राप से उद्धार करने के लिए शंकर की घोर आराधना की । तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर ने गंगा को पृथ्वी पर उतारा।
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इस प्रकार 'ज्येष्ठ मासे सिते पक्षे दशमी बुध हस्तयोः। व्यतिपाते गरा नन्दे कन्या चन्द्रे बृषे रवौ । हरते दश पापानि तस्माद् दसहरा स्मृता ।।


अर्थात- ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि बुधवार, हस्त नक्षत्र में दस प्रकार के पापों का नाश करने वाली गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। उस समय गंगा तीन धाराओं में प्रकट होकर तीनों लोकों में गयीं और संसार में त्रिसोता के नाम से विख्यात हुईं । गंगा ध्यान एवं स्नान से प्राणी दस प्रकार के दोषों काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल-कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्त हो जाता है, यही नहीं अवैध संबंध, अकारण जीवों को कष्ट पहुंचाने, असत्य बोलने व धोखा देने से जो पाप लगता है, वह पाप भी गंगा स्नान से धुल जाता है। स्नान करते समय माँ गंगा का 
इस मंत्र की जप करना चाहिए।

'विष्णुपादार्घ्य सम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि। धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि ।। द्वारा ध्यान करना चाहिए और डुबकी लगाते समय श्रीहरि द्वारा बताए गये सर्व पापहारी मंत्र- ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः। जप करते रहने से तत्क्षण लाभ मिलता है। 
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