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Muharram 2020: मुहर्रम पर क्यों मनाते हैं मातम, जानिए इसका इतिहास और महत्व
Sat, 29 Aug 2020 01:54 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 29 Aug 2020 01:54 PM IST
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Muharram 2020
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- Muharram 2020 Date History Singnificance: मुस्लिम समुदाय के लिए मुहर्रम का विशेष महत्व होता है। मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मुहर्रम हिजरी संवत का पहला महीना होता है। मुस्लिम समुदाय के लिए मुहर्रम का बहुत ही ज्यादा महत्व होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 29 अगस्त से मुहर्रम महीने की शुरुआत हो रही है। इसी महीने से इस्लाम धर्म को मनाने वालों के लिए हिजरी का नया वर्ष आरंभ हो जाता है। मुस्लिम समुदाय के लोग मुहर्रम को गम के रूप में मनाते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं मुहर्रम के दिन क्यों मनाया जाता है मातम और इसका इतिहास...
- इमाम हुसैन की शहादत की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। यह कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है। जिसमें शिया मुस्लिम दस दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं। इमाम हुसैन अल्लाह के रसूल यानी मैसेंजर पैगंबर मोहम्मद के नाती थे। मुहर्रम एक महीना है।
- मोहम्मद साहब के मरने के लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया। कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है। वहां यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया। लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा। यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था। लेकिन उसके सामने हजरत मुहम्मद के वारिस और उनके कुछ साथियों ने यजीद के सामने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया।
- अपने बीवी बच्चों की सलामती के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे तभी रास्ते में कर्बला के पास यजीद ने उन पर हमला कर दिया। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की फौज से डटकर सामना किया। हुसैन लगभग 72 लोग थे और यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिक थे लेकिन फिर भी उन लोगों ने यजीद की फौज के समाने घुटने नहीं टेके।
- हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए। किसी तरह हुसैन इस लड़ाई में बच गए। यह लड़ाई मुहर्रम 2 से 6 तक चली। आखिरी दिन हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन किया। मुहर्रम के दसवें दिन जब हुसैन नमाज अदा कर रहे थे, तब यजीद ने धोखे से उन्हें भी मरवा दिया। उस दिन से मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के त्योहार के रूप में मनाया जाता है।
- ये शिया मुस्लिमों का अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका है। मुहर्रम के दस दिनों तक बांस, लकड़ी का इस्तेमाल कर तरह-तरह से लोग इसे सजाते हैं और ग्यारहवें दिन इन्हें बाहर निकाला जाता है। लोग इन्हें सड़कों पर लेकर पूरे नगर में भ्रमण करते हैं सभी इस्लामिक लोग इसमें इकट्ठे होते हैं। इसके बाद इन्हें इमाम हुसैन की कब्र बनाकर दफनाया जाता है। एक तरीके से 60 हिजरी में शहीद हुए लोगों को एक तरह से यह श्रद्धांजलि दी जाती है।
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