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Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय न करें ऐसी भूल, जानिए जलाभिषेक के नियम

Sun, 15 Feb 2026 06:04 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Sun, 15 Feb 2026 06:04 AM IST
सार

Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए जलाभिषेक का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि जो भी शिवभक्त शिवलिंग पर सच्चे मन एक लोटा जल अर्पित करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। 

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Mahashivratri 2026 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Mahashivratri 2026: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का सबसे पावन पर्व माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात्रि शिवजी का ज्योतिर्लिंग स्वरूप प्रकट हुआ था और इसी दिन उनका विवाह माता पार्वती से भी हुआ। इस दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से समस्त पापों का नाश और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। मान्यता है कि शिवजी ऐसे भोलेभंडारी हैं उन पर श्रद्धा से अर्पित किया हुआ एक लोटा जल भी प्राणी की सभी समस्याओं का हल कर देता है। लेकिन शास्त्रों के अनुसार यदि जल चढ़ाने की विधि में त्रुटि हो जाए तो पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। इसलिए शिवलिंग पर जल अर्पित करने से पहले कुछ महत्वपूर्ण नियम जान लेना आवश्यक है।

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1. किस जल से करें अभिषेक ?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार शिवलिंग पर गंगाजल सर्वोत्तम माना गया है। यदि गंगाजल उपलब्ध न हो तो स्वच्छ शुद्ध जल का प्रयोग करें। जल में थोड़ा सा कच्चा दूध, शहद या गंगाजल मिलाकर भी अभिषेक किया जा सकता है। परंतु दूषित या अशुद्ध जल चढ़ाना वर्जित है।
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2. जल चढ़ाने की क्या है सही दिशा
शिवलिंग पर जल हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके चढ़ाना चाहिए। जल अर्पित करते समय उसे सीधे लिंग पर धीरे-धीरे गिराएं। शास्त्रों में कहा गया है कि शिवलिंग की जलाधारी (जहां से जल बाहर निकलता है) को कभी पार नहीं करना चाहिए। उसे लांघना अशुभ माना गया है।
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3. तांबे के पात्र का महत्व
पौराणिक मान्यता है कि तांबे के लोटे से जल अर्पित करना शुभ फलदायी होता है। तांबा पवित्र धातु मानी गई है और इससे चढ़ाया गया जल शिवजी को प्रिय होता है।चांदी,स्टील एवं पीतल के पात्र से भी जल चढ़ाया जा सकता है परन्तु लोहे या प्लास्टिक के पात्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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4. जल चढ़ाते समय मंत्रोच्चार
सिर्फ जल चढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। जलाभिषेक करते समय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप अवश्य करें। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी विशेष फलदायी माना गया है। मंत्रों के साथ किया गया अभिषेक मन और आत्मा को शुद्ध करता है।

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5. बेलपत्र और अन्य सामग्री का नियम
जल चढ़ाने के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें। बेलपत्र तीन पत्तों वाला और बिना टूटा हुआ होना चाहिए। ध्यान रखें कि बेलपत्र उल्टा न रखें। इसके साथ धतूरा, आक का फूल और भस्म भी अर्पित की जा सकती है।

6. तुलसी न चढ़ाएं
वैष्णव परंपरा में पूजित तुलसी माता को शिवलिंग पर नहीं चढ़ाया जाता। शास्त्रों में इसे वर्जित बताया गया है।

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7. जलाभिषेक का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग पर जल अर्पित करना मन की तपन और जीवन की कठिनाइयों को शांत करने का प्रतीक है। जैसे जल अग्नि को शांत करता है, वैसे ही शिवाभिषेक जीवन के कष्टों को शीतल करता है। महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है। प्रत्येक प्रहर में जलाभिषेक करने से शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

अंत में यही ध्यान रखें कि पूजा बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि श्रद्धा और शुद्ध भाव से पूर्ण होती है। नियमों का पालन करें, मंत्रोच्चार करें और मन, वचन व कर्म से पवित्र रहकर भोलेनाथ की आराधना करें। तभी महाशिवरात्रि का व्रत और जलाभिषेक पूर्ण फल प्रदान करेगा।

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