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Hindi News ›   Spirituality ›   Festivals ›   Mahashivratri 2025 date and shubh yog know shiv chalisa niyam and benefits in hindi

Mahashivratri 2025: आने वाला है महाशिवरात्रि का पर्व, इस चालीसा और आरती से करें भगवान शिव को प्रसन्न

Mon, 10 Feb 2025 06:44 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Mon, 10 Feb 2025 06:44 PM IST
सार

Mahashivratri 2025: हिंदू पंचांग के मुताबिक फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि मनाई जाती है और इस वर्ष 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि है। शास्त्रों में इसे शिव-पार्वती के मिलन का दिन कहते हैं।

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Mahashivratri 2025 date and shubh yog know shiv chalisa niyam and benefits in hindi
महाशिवरात्री 2025 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

Mahashivratri 2025: हिंदू पंचांग के मुताबिक फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि मनाई जाती है और इस वर्ष 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि है। शास्त्रों में इसे शिव-पार्वती के मिलन का दिन कहते हैं। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था, इसलिए हर साल इस तिथि को उनकी वैवाहिक वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। वहीं हरिद्वार और उज्जैन में महाशिवरात्रि के पर्व को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यहां सभी धार्मिक स्थलों और मंदिरों से लेकर पूजा पंडाल में माता पार्वती और शिव जी की झांकियां निकाली जाती हैं। ज्योतिषियों की मानें तो यह दिन शंकर जी को प्रसन्न और उनकी कृपा पाने के लिए उत्तम है। इस दिन महादेव को एक लोटा जल और बेलपत्र अर्पित करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उसके कार्यों में आ रही बाधाएं भी समाप्त होती हैं। इस दौरान पूजा के समय शिव चालीसा का पाठ करना न भूलें, यह बहुत शुभ होता है। ऐसे में आइए इस शक्तिशाली चालीसा के बारे में जानते हैं।

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भगवान शिव की आरती 
जय शिव ओंकारा ऊँ जय शिव ओंकारा । 
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
एकानन चतुरानन पंचानन राजे। 
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। 
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी। 
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। 
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता । 
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। 
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी। 
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे । 
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
जय शिव ओंकारा हर ऊँ शिव ओंकारा। 
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥ ऊँ जय शिव ओंकारा...॥ 

शिव चालीसा 

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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