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Kalashtami 2019 : जानें सभी मुश्किलों से उबारने वाले काल भैरव का कैसे हुआ प्राकट्य

Tue, 25 Jun 2019 08:48 AM IST
Madhukar Mishra धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Madhukar Mishra Updated Tue, 25 Jun 2019 08:48 AM IST
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कालभैरव अष्टमी 2019

भगवान भैरव की साधना-आराधना का कालाष्टमी व्रत 25 जून को मनाया जायेगा। मान्यता है कि कालभैरव अष्टमी वाले दिन ही भगवान काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। काल भैरव को काशी के कोतवाल के नाम से भी जाना जाता है। देश के तमाम शक्तिपीठों में भगवान भैरव अलग-अलग रुपों में पूजे जाते हैं। किसी भी शक्तिपीठ के दर्शन तब तक नहीं पूरे होते जब तक आप भगवान भैरवनाथ के दर्शन न कर लें।

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अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाले भगवान भैरव की कथा जानने के लिए आगे की स्लाइड क्लिक करें — 

काल भैरव के प्राकट्य की कथा

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कालभैरव अष्टमी 2019

कालभैरव के जन्म को लेकर पुराणों में एक बड़ी ही रोचक कथा है। शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में कौन सर्वश्रेष्ठ है इस बात को लेकर वाद-विवाद पैदा हो गया। तब दोनों ने अपने आपको श्रेष्ठ बताया और आपस में  एक दूसरे से युद्ध करने लगे। इसके बाद सभी देवताओं ने वेद से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है भगवान शिव ही सर्वश्रेष्ठ हैं।

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जब ब्रह्माजी ने शिवजी को कहा भला-बुरा

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कालभैरव अष्टमी 2019

वेद के द्वारा भगवान शिव की महिमा ब्रह्माजी को पसंद नहीं आई और उन्होंने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद अत्यंत दु:खी हुए। उसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। तब ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रूद्र रखा है इसलिए तुम मेरी सेवा में आ जाओ।

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तब शिव के अवतार ने नाखून से काट दिया ब्रह्मा का सिर 

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कालभैरव अष्टमी 2019

ब्रह्माजी के इस आचरण पर भगवान शिव को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने उसी क्षण भैरव को प्रकट करते हुए कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को ही काट दिया।

काशी में दूर हुआ ब्रह्म हत्या का दोष

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कालभैरव अष्टमी 2019

इस पूरे प्रकरण के बाद भगवान शिव के कहने पर भैरव जी काशी को कर गए, जहां उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्ति किया। आज भी वाराणसी में भगवान भैरव काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। जिनका दर्शन किये बगैर बाबा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।

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