Kalashtami 2019 : जानें सभी मुश्किलों से उबारने वाले काल भैरव का कैसे हुआ प्राकट्य
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भगवान भैरव की साधना-आराधना का कालाष्टमी व्रत 25 जून को मनाया जायेगा। मान्यता है कि कालभैरव अष्टमी वाले दिन ही भगवान काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। काल भैरव को काशी के कोतवाल के नाम से भी जाना जाता है। देश के तमाम शक्तिपीठों में भगवान भैरव अलग-अलग रुपों में पूजे जाते हैं। किसी भी शक्तिपीठ के दर्शन तब तक नहीं पूरे होते जब तक आप भगवान भैरवनाथ के दर्शन न कर लें।
अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाले भगवान भैरव की कथा जानने के लिए आगे की स्लाइड क्लिक करें —
काल भैरव के प्राकट्य की कथा
कालभैरव के जन्म को लेकर पुराणों में एक बड़ी ही रोचक कथा है। शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में कौन सर्वश्रेष्ठ है इस बात को लेकर वाद-विवाद पैदा हो गया। तब दोनों ने अपने आपको श्रेष्ठ बताया और आपस में एक दूसरे से युद्ध करने लगे। इसके बाद सभी देवताओं ने वेद से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है भगवान शिव ही सर्वश्रेष्ठ हैं।
जब ब्रह्माजी ने शिवजी को कहा भला-बुरा
वेद के द्वारा भगवान शिव की महिमा ब्रह्माजी को पसंद नहीं आई और उन्होंने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद अत्यंत दु:खी हुए। उसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। तब ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रूद्र रखा है इसलिए तुम मेरी सेवा में आ जाओ।
तब शिव के अवतार ने नाखून से काट दिया ब्रह्मा का सिर
ब्रह्माजी के इस आचरण पर भगवान शिव को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने उसी क्षण भैरव को प्रकट करते हुए कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को ही काट दिया।
काशी में दूर हुआ ब्रह्म हत्या का दोष
इस पूरे प्रकरण के बाद भगवान शिव के कहने पर भैरव जी काशी को कर गए, जहां उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्ति किया। आज भी वाराणसी में भगवान भैरव काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। जिनका दर्शन किये बगैर बाबा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।