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Holi 2020: ऐसे खेली जाती है बरसाने की लट्ठमार होली

Tue, 03 Mar 2020 08:18 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: रुस्तम राणा Updated Tue, 03 Mar 2020 08:18 AM IST
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Holi 2020 know anout barsane ki lathmar holi
लठमार होली - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

बरसाना की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस होली में राधा और भगवान कृष्ण के प्रेम का रस होता है। राधाकृष्ण के प्रेम का प्रतीक यह त्योहार अपने आप में अद्भुत है। ब्रज की होली में समाज गायन विशेष स्थान रखता है, जिसमें होली गीत और पद गायन की अनूठी परंपरा है। इसमें पारंपरिक अंदाज में ठाकुरजी के समक्ष ब्रजवासी-सेवायत ब्रजभाषा में होली पदों का गायन करते हैं। इस दिन ब्रज में देश-विदेशी भक्तों के साथ पूरा मथुरा यहां जुटता है। भगवान कृष्ण के गांव गोकुल में छड़ीमार होली खेली जाती है। गोकुल में श्रीकृष्ण बाल रूप में रहे थे, इसलिए यहां लाठी के बजाए छड़ी होली जाती है, ताकि उन्हें ज्यादा चोट न लगे।

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ऐसा होगा आयोजन
3 मार्च को अष्टमी के दिन बरसाने में खेली जाएगी लड्डू होली।
4 मार्च को बरसाने में लठमार होली।
5 मार्च को दशमी के दिन नन्दगांव व रावल गांव में लठमार होली।
6 मार्च को श्रीकृष्ण जन्मभूमि एवं ठा. बांके बिहारी मंदिर में क्रमशः सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं होली।
7 मार्च को गोकुल में छड़ीमार होली।

पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है बरसाने की लट्ठमार होली
बरसाने का लट्ठमार होली न सिर्फ देश में मशहूर है बल्कि पूरी दुनिया में भी काफी प्रसिद्ध है। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को बरसाने में लट्ठमार होली मनाई जाती है। नवमी के दिन यहां का नजारा देखने लायक होता है। यहां लोग रंगों, फूलों के अलावा डंडों से होली खेलने की परंपरा निभाते है। 
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नंद गांव के लोग होली खेलने जाते हैं बरसाने
बरसाना में राधा जी का जन्म हुआ था। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को नंदगांव के लोग होली खेलने के लिए बरसाना गांव जाते हैं। जहां पर लड़कियों और महिलाओं के संग लट्ठमार होली खेली जाती है। इसके बाद फाल्गुन शुक्ल की दशमी तिथि पर रंगों की होली खेली होती है।
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भगवान श्रीकृष्ण के समय से चली आ रही है ये परंपरा
लट्ठमार होली खेलने की परंपरा भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण अपने दोस्तों संग नंदगांव से बरसाना जाते हैं। बरसाना पहुंचकर वे राधा और उनकी सखियों संग होली खेलते हैं। इस दौरान कृष्णजी राधा संग ठिठोली करते है जिसके बाद वहां की सारी गोपियां उन पर डंडे बरसाती है।


लाठी और ढाल के साथ खेली जाती है होली
गोपियों के डंडे की मार से बचने के लिए नंदगांव के ग्वाले लाठी और ढालों का सहारा लेते हैं। यही परंपरा धीरे-धीरे चली आ रही है जिसका आजतक पालन किया जा रहा है। पुरुषों को हुरियारे और महिलाओं को हुरियारन कहा जाता है। इसके बाद सभी मिलकर रंगों से होली का उत्सव मनाते है।

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