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करवा चौथ व्रत: जानिए सबसे पहले किसने रखा था यह व्रत, क्या हैं पौराणिक मान्यताएं
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Updated Thu, 25 Oct 2018 12:18 PM IST
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करवा चौथ व्रत कथा
27 अक्टूबर, शनिवार को करवा चौथ का व्रत रखा जाएगा। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। इस दिन महिलाएं बिना जल और अन्न के दिनभर उपवास रखती हैं और शाम को चांद के पूजा दर्शन के बाद पति के हाथों से पानी पीकर व्रत खोलती हैं। करवा चौथ का व्रत सदियों से चला आ रहा है। करवाचौथ की परंपरा देवताओं के समय से चली आ रही है। शास्त्रों और पुराणों में इसके पीछे कई मान्यताएं प्रचलित हैं।
द्रौपदी ने पांडवों के लिए रखा था करवा चौथ का व्रत
मान्यता के अनुसार, जब पांडव नीलगिरि के जंगल में तपस्या और भ्रमण कर रहे थे तब द्रौपदी उनके लिए काफी परेशान होने लगी थी। द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से अपनी परेशानी बताई और पांडवों की रक्षा करने के लिए उपाय पूछा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को करवा चौथ का व्रत रखने की सलाह दी जिसके बाद पांडवों की सकुशल वापसी संभव हो पायी।
माता पार्वती ने सबसे पहले रखा था यह व्रत
इसके अलावा एक अन्य कथा प्रचलित है जिसके अनुसार सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राणों की भीख मांगी थी कि उसके सुहाग को वह न ले जाएं। तभी से महिलाएं इस व्रत का पालन करती हैं। मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत शिवजी के लिए रखा था। इसके बाद ही उन्हें अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था। इसलिए इस व्रत में भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा की जाती है।
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भगवान राम ने बताया था करवा चौथ का महत्व
वहीं करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करने के बारे में लंका कांड में एक कथा है जब भगवान राम समु्द्र पार करके लंका पहुंचे तो उन्होंने चांद पर पड़ने वाली छाया के बारे में बताया कि विष और चंद्रमा दोनों ही समुद्र मंथन से निकले थे जिस कारण से चंद्रमा विष को अपना भाई मानते हैं। इस कारण से विष को अपने ह्रदय में स्थान दे रखा है। इसी कारण से करवा चौथ के दिन महिलाएं चांद की पूजा करती हैं और पति से दूर न रहने की कामना करती हैं।
सभी देवताओं की पत्नियों ने एक साथ रखा था करवा चौथ व्रत
एक बार देवताओं और राक्षसों के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया जिसमें देवताओं की हार होने लगी। हार से बचने के लिए सभी देवता ब्रह्राजी के पास गए। तब उन्होंने जीत के लिए उपाय बताया। ब्रह्मदेव ने कहा कि इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को अपने-अपने पतियों के लिए व्रत रखना चाहिए और सच्चे दिल से उनकी विजय के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा और अपने पतियों की विजय के लिए प्रार्थना की। इसके बाद युद्ध में देवताओं की विजय हुई। तब से करवा चौथ के व्रत रखने की परंपरा आरंभ होने लगी।
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द्रौपदी ने पांडवों के लिए रखा था करवा चौथ का व्रत
मान्यता के अनुसार, जब पांडव नीलगिरि के जंगल में तपस्या और भ्रमण कर रहे थे तब द्रौपदी उनके लिए काफी परेशान होने लगी थी। द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से अपनी परेशानी बताई और पांडवों की रक्षा करने के लिए उपाय पूछा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को करवा चौथ का व्रत रखने की सलाह दी जिसके बाद पांडवों की सकुशल वापसी संभव हो पायी।
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माता पार्वती ने सबसे पहले रखा था यह व्रत
इसके अलावा एक अन्य कथा प्रचलित है जिसके अनुसार सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राणों की भीख मांगी थी कि उसके सुहाग को वह न ले जाएं। तभी से महिलाएं इस व्रत का पालन करती हैं। मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत शिवजी के लिए रखा था। इसके बाद ही उन्हें अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था। इसलिए इस व्रत में भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा की जाती है।
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भगवान राम ने बताया था करवा चौथ का महत्व
वहीं करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करने के बारे में लंका कांड में एक कथा है जब भगवान राम समु्द्र पार करके लंका पहुंचे तो उन्होंने चांद पर पड़ने वाली छाया के बारे में बताया कि विष और चंद्रमा दोनों ही समुद्र मंथन से निकले थे जिस कारण से चंद्रमा विष को अपना भाई मानते हैं। इस कारण से विष को अपने ह्रदय में स्थान दे रखा है। इसी कारण से करवा चौथ के दिन महिलाएं चांद की पूजा करती हैं और पति से दूर न रहने की कामना करती हैं।
सभी देवताओं की पत्नियों ने एक साथ रखा था करवा चौथ व्रत
एक बार देवताओं और राक्षसों के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया जिसमें देवताओं की हार होने लगी। हार से बचने के लिए सभी देवता ब्रह्राजी के पास गए। तब उन्होंने जीत के लिए उपाय बताया। ब्रह्मदेव ने कहा कि इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को अपने-अपने पतियों के लिए व्रत रखना चाहिए और सच्चे दिल से उनकी विजय के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा और अपने पतियों की विजय के लिए प्रार्थना की। इसके बाद युद्ध में देवताओं की विजय हुई। तब से करवा चौथ के व्रत रखने की परंपरा आरंभ होने लगी।