फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Festivals ›   jagannath rath yatra puri 2019 rath yatra history

जगन्नाथ रथ यात्रा 2019 : जानिए रथ यात्रा का इतिहास और महत्व

Thu, 04 Jul 2019 10:21 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 04 Jul 2019 10:21 AM IST
विज्ञापन
jagannath rath yatra puri 2019 rath yatra history
पुरी रथयात्रा 2019

4 जुलाई से विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकलेगी। इस रथ यात्रा में देश-विदेश के लाखों भक्त इस यात्रा में शामिल होते हैं। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को तीन अलग-अलग रथों में विराजित कर निकाली जाती है। पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का उत्सव आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है, जो इस बार 4 जुलाई 2019 से शुरू हो रही है। इस रथयात्रा उत्सव में भगवान जगन्नाथ को रथ पर विराजमान करके पूरे नगर में भ्रमण कराया जाता है। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के रथ भी निकाले जाते हैं। रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुण्डिच्चा मंदिर तक पहुंचती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकालने की यह परंपरा काफी पुरानी है और वर्षों से चली आ रही है। इस पवित्र रथ यात्रा से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित है। आइए जानते हैं कैसे शुरू हुई विश्व प्रसिद्ध जगन्ननाथ यात्रा और क्या है इसका इतिहास।  

विज्ञापन


कलयुग के प्रारंभिक काल में मालव देश पर राजा इंद्रद्युम का शासन था। वह भगवान जगन्नाथ का भक्त था। एक दिन इंद्रद्युम भगवान के दर्शन करने नीलांचल पर्वत पर गया तो उसे वहां देव प्रतिमा के दर्शन नहीं हुए। निराश होकर जब वह वापस आने लगा तभी आकाशवाणी हुई कि शीघ्र ही भगवान जगन्नाथ मूर्ति के स्वरूप में पुन: धरती पर आएंगे। यह सुनकर वह खुश हुआ।
विज्ञापन


आकाशवाणी के कुछ दिनों बाद एक बार जब इंद्रद्युम पुरी के समुद्र तट पर टहल रहा थे, तभी उन्हें समुद्र में लकड़ी के दो विशाल टुकड़े तैरते हुए दिखाई दिए। तब उन्हें आकाशवाणी की याद आई और सोचा कि इसी लकड़ी से वह भगवान की मूर्ति बनाएंगे। फिर वह लकड़ी को महल में अपने साथ उठा लाएं  तभी भगवान की आज्ञा से देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा वहां बढ़ई के रूप में प्रगट हुए और उन्होंने उन लकड़ियो से भगवान की मूर्ति बनाने के लिए राजा से कहा। राजा ने तुरंत इसकी आज्ञा दी।
विज्ञापन
विज्ञापन


लेकिन मूर्ति बनाने से पहले बढ़ई रूपी विश्वकर्मा ने एक शर्त रख दी। शर्त के मुताबिक वह मूर्ति का निर्माण एकांत में ही करेगा और यदि निर्माण कार्य के दौरान कोई वहां आया तो वह काम अधूरा छोड़कर चला जाएगा।

राजा ने शर्त मान ली। इसके बाद विश्वकर्मा ने गुण्डिचा नामक जगह पर मूर्ति बनाने का काम शुरू कर दिया। कुछ दिन बाद एक दिन राजा भूलवश जिस स्थान पर विश्वकर्मा मूर्ति बना रहे थे वहां पहुंच गए। तब उन्हें देखकर विश्वकर्मा वहां से अन्तर्धान हो गए और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी रह गईं।


 तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में स्थापित होना चाहते हैं। तब राजा इंद्रद्युम ने विशाल मंदिर बनवाकर तीनों मूर्तियों को वहां स्थापित कर किया। साथ यह भी आकाशवाणी हुई कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी जन्मभूमि जरूर आएंगे। स्कंदपुराण के उत्कल खंड के अनुसार राजा इंद्रद्युम ने आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रभु के उनकी जन्मभूमि जाने की व्यवस्था की। तभी से यह परंपरा रथयात्रा के रूप में चली आ रही है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed