Happy Diwali 2022: ॐ जय लक्ष्मी माता...ऐसे करें मां लक्ष्मी जी की आरती...
मां लक्ष्मी जी की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निशदिन सेवत मैया जी को निशदिन सेवत
हरि विष्णु विधाता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
उमा रमा ब्रह्माणी तुम ही जगमाता मैया तुम ही जगमाता
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
दुर्गा रूप निरंजनी सुख सम्पत्ति दाता मैया सुख सम्पत्ति दाता
जो कोई तुमको ध्यावत ऋद्धि-सिद्धि धन पाता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
तुम पाताल निवासिनि तुम ही शुभदाता मैया तुम ही शुभदाता
कर्मप्रभाव प्रकाशिनी भवनिधि की त्राता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
जिस घर में तुम रहती सब सद्गुण आता मैया सब सद्गुण आता
सब सम्भव हो जाता मन नहीं घबराता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
तुम बिन यज्ञ न होते वस्त्र न कोई पाता मैया वस्त्र न कोई पाता
खान पान का वैभव सब तुमसे आता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
शुभ गुण मन्दिर सुन्दर क्षीरोदधि जाता
मैया सुन्दर क्षीरोदधि जाता रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
महालक्ष्मीजी की आरती जो कोई नर गाता
मैया जो कोई नर गाता उर आनन्द समाता पाप उतर जाता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निशदिन सेवत हरि विष्णु विधाता
।।ॐ जय लक्ष्मी माता।।
।। मैया जय लक्ष्मी माता।।
क्या कहते हैं पुराण ?
मान्यता है कि देव पूजन के समय किसी भी तरह की त्रुटि या कमी रह जाती है तो आरती के माध्यम से उसकी पूर्ति हो जाती है। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि-
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् पूजनं हरेः।
सर्व सम्पूर्णतामेत कृते नीराजने शिवे।
इसका अर्थ है कि पूजन मंत्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी अपने आराध्य की आरती कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है। वहीं अन्य ग्रंथों में 'प्रकाश'को ज्ञान का प्रतीक माना गया है,परमात्मा प्रकाश और ज्ञान रूप में ही हर जगह विद्यमान हैं। ज्ञान प्राप्त होने से अज्ञान रुपी मनोविकार दूर होते हैं और सांसारिक शूल मिटते हैं। इसलिए आरती के माध्यम से प्रकाश की पूजा को भगवान की पूजा भी माना गया है।मंदिर में आरती करते समय यही उद्देश्य होता है कि प्रभु हमारे मन से अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करके ज्ञानरूपी प्रकाश फैलाएं। गहरे अंधकार से मुझे परम प्रकाश की ओर ले चलें। जो भक्त श्रद्धा,आत्मविश्वास और एकाग्रता के साथ देव आरती के दर्शन करता है उसको मनोकूल फल प्राप्त होते हैं। इसके अलावा दीपज्योति के दर्शन से पाप नष्ट होते हैं,शत्रुओं का शमन होता है एवं आयु,आरोग्य व सुखमय जीवन की वृद्धि होती है।
नियमानुसार करें आरती-
अपने आराध्य की आरती के दौरान यदि आरती के नियमों का पालन किया जाए तो पूजा का संपूर्ण फल मिलता है। आरती के लिए आप तांबे,पीतल या फिर चांदी की थाली ले सकते हैं। इसके बाद थाली में रोली,कुमकुम,अक्षत,ताज़े पुष्प और प्रसाद के लिए कुछ मीठा रख लें। मिट्टी,चांदी,तांबे अथवा पीतल के दीपक में शुद्ध घी का आरती के लिए पांच या सात बत्तियों वाला दीपक जलाया जाता है। कपूर से भी आरती कर सकते हैं। ढोल,नगाड़े,शंख,घंटा आदि की ध्वनि तथा ऊँचे स्वर में एक ही लय ताल से आरती गान करना चाहिए। ऐसा करने से आपके अंदर आध्यात्मिक ऊर्जा का स्तर बड़ जाता है। शुभ फल की प्राप्ति के लिए आरती करते समय थाली या दीपक को अपने इष्टदेवी-देवता के समक्ष इस प्रकार घुमाया जाना चाहिए कि घुमाते हुए ॐ जैसी आकृति बन जाए। आरती अपनी बाईं ओर से दाईं ओर चलाते हुए सबसे पहले इसे भगवान के श्री चरणों की तरफ चार बार घुमाएं उसके बाद उनकी नाभि की तरफ दो बार और मुख की तरफ ले जाकर एक बार घुमाएं। इसी तरह कुल सात बार से ज्यादा आरती को दोहराना चाहिए। आरती के बाद शंख या लोटे में रखे जल से आरती करके सभी पर छिड़काव करना बहुत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे जीवन के सभी विकार दूर हो जाते हैं,सुख-समृद्धि आती है।आरती के पश्चात् दोनों हाथों से आरती ग्रहण करने के पीछे यह तर्क माना गया है कि ईश्वर की शक्ति उस ज्योति में समा जाती है जिसको भक्त अपने मस्तक पर ग्रहण करके धन्य हो जाते है।
कितने दीपक जलाएं-
दीपक जलाने के बारे में मान्यता है कि सम संख्या में इन्हें जलाने से ऊर्जा संवहन निष्क्रिय हो जाता है,जब कि विषम संख्या में जलाने पर वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है।यही वजह है कि आरती करते समय पांच,सात,ग्यारह,इक्कीस आदि विषम संख्या में दीपक लगाए जाते हैं।