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Chhath 2021: छठी मैया ने प्रियवत को दिया संतान का वरदान, छठ के महापर्व पर पढ़िए छठी मैया की ये पावन कथा

Fri, 05 Nov 2021 05:04 PM IST
शशि सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: शशि सिंह Updated Fri, 05 Nov 2021 05:04 PM IST
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chhath puja 2021 date significance and vrat katha of chhath mahaparv chhathi maiya story
छठ पूजा 2021 - फोटो : Self

हर साल कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पर्व मनाया जाता है। यह व्रत बेहद ही कठिन माना जाता है। वैसे तो छठ का पर्व विषेश रूप से बिहार में मनाया जाता है लेकिन इस महापर्व की धूम देश के अलावा विदेशों में भी देखने को मिलती है। छठ का ये महापर्व नहाय खाय से आरंभ होता है और खरना के बाद षष्ठी तिथि को मुख्य व्रत पर सूर्य को अर्घ्य देने के बाद सप्तमी में इस व्रत का पारण किया जाता है। ये व्रत मुख्य रूप से महिलाएं संतान के लिए रखती हैं लेकिन इसे पुरुषों के द्वारा भी किया जाता है। इस व्रत में प्रातः उगते सूर्य और संध्या काल में अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। छठ व्रत में नदी या सरोवर में कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस बार छठ का मुख्य पर्व 10 नवंबर 2021 दिन बुधवार कि किया जाएगा। इस पर्व में मुख्य रूप से सूर्य देव और उनकी बहन षष्ठी या छठी मैया का पूजन किया जाता है। तो चलिए जानते हैं छठी मईया की पावन कथा।  

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छठ व्रत की पावन कथा
छठ व्रत की प्रचलित कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस कारण राजा और उसकी पत्नी दोनों ही बहुत दुखी रहा करते थे। संतान प्राप्ति की इच्छा से राजा प्रियवत ने महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गई, लेकिन नौ माह के पश्चात रानी ने मरे हुए पुत्र को जन्म दिया। इससे राजा को अत्यधिक आघात पहुंचा और शोक में आकर उन्होंने अपने जीवन को त्यागने का मन बना लिया लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुई।
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प्रकट हुईं षष्ठी देवी
देवी ने राजा से कहा कि मैं षष्टी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरा पूजन पूरी श्रद्घा के साथ करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया। इसके बाद राजा ने अपनी पत्नी के साथ कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा। इसलिए कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को संतान की लंबी आयु और संतान प्राप्ति की कामना के लिए छठ का व्रत किया जाता है।
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द्रोपदी ने रखा छठ का व्रत
इसी के साथ महाभारत काल से भी छठ व्रत की कथा जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को वापस राजपाट की प्राप्ति हुई।
 

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