फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Festivals ›   Bhishma Ashtami 2020 date muhurat and bhishma ashtami katha

Bhishma Ashtami 2020: कब है भीष्म अष्टमी का पर्व, जानें मुहूर्त एवं पौराणिक कथा

Fri, 31 Jan 2020 02:00 PM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: रुस्तम राणा Updated Fri, 31 Jan 2020 02:00 PM IST
विज्ञापन
Bhishma Ashtami 2020 date muhurat and bhishma ashtami katha
भीष्म अष्टमी 2020

भीष्म अष्टमी का पर्व महाभारत के महान पात्र भीष्म पितामह को समर्पित है। यह दिन बेहद ही भाग्यशाली होता है, इसलिए लोग आज के दिन भीष्म अष्टमी का व्रत रखते है। पौराणिक रूप से यह पर्व भीष्म पितामह की मृत्यु का प्रतीक है। इसी दिन भीष्म पितामह ने अपने प्राण को त्यागा था। इस पावन दिन को उन्होंने स्वयं ही चुना था। भीष्म अष्टमी का उत्सव राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में होता है। सभी इस्कॉन मंदिरों के साथ-साथ भगवान विष्णु के मंदिरों में भीष्म पितामह के सम्मान में भव्य उत्सव होता है। 

विज्ञापन


कब है भीष्म अष्टमी 2020?
हिन्दू पंचांग के अनुसार, यह त्योहार प्रति वर्ष माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। भीष्म अष्टमी का पर्व इस साल 2 फरवरी को मनाया जाएगा। 

भीष्म अष्टमी का मुहूर्त
माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि प्रारंभ - 18:08 (01 फरवरी 2020)
माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि समापन - 20:00 बजे तक (02 फरवरी 2020)

भीष्म अष्टमी व्रत कथा क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार, भीष्म देवी गंगा और राजा शांतनु के आठवें पुत्र थे जिनका मूल नाम देवव्रत था जो उनके जन्म के समय दिया गया था। अपने पिता को खुश करने के लिए और अपने जीवन के लिए, देवव्रत ने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। देवव्रत को मुख्य रूप से मां गंगा द्वारा पोषित किया गया था और बाद में महर्षि परशुराम को शास्त्र विद्या प्राप्त करने के लिए भेजा गया था। उन्होंने शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में महान युद्ध कौशल और सीख हासिल की और अजेय बन गए।
विज्ञापन


अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, देवी गंगा देवव्रत को अपने पिता, राजा शांतनु के पास लायीं और फिर उन्हें हस्तिनापुर का राजकुमार घोषित किया गया। इस दौरान, राजा शांतनु को सत्यवती नाम की एक महिला से प्रेम हो गया और वह उससे विवाह करना चाहते थे। लेकिन सत्यवती के पिता ने एक शर्त पर गठबंधन के लिए सहमति व्यक्त की कि राजा शांतनु और सत्यवती की संतानें ही भविष्य में हस्तिनापुर राज्य का शासन करेंगी।
विज्ञापन
विज्ञापन


स्थिति को देखते हुए, देवव्रत ने अपने पिता की खातिर अपना राज्य छोड़ दिया और जीवन भर कुंवारे रहने का संकल्प लिया। ऐसे संकल्प और बलिदान के कारण, देवव्रत भीष्म नाम से पूजनीय थे। और उनकी प्रतिज्ञा को भीष्म प्रतिज्ञा कहा गया। यह सब देखकर, राजा शांतनु भीष्म से बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार उन्होंने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। अपने जीवनकाल के दौरान, भीष्म को भीष्म पितामह के रूप में बहुत सम्मान और मान्यता मिली।

महाभारत के युद्ध में, वह कौरवों के साथ खड़े थे और उन्होंने उनका पूरा समर्थन किया। भीष्म पितामह ने शिखंडी के साथ युद्ध नहीं करने और उसके खिलाफ किसी भी प्रकार का हथियार न चलाने का संकल्प लिया था। राजा अर्जुन ने शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्म पर हमला किया और इसलिए भीष्म घायल होकर बाणों की शय्या पर गिर पड़े।


हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह माना जाता है कि जो व्यक्ति उत्तरायण के शुभ दिन पर अपना शरीर छोड़ता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है, इसलिए उन्होंने कई दिनों तक बाणों की शैय्या पर प्रतीक्षा की और अंत में अपने शरीर को छोड़ दिया। उत्तरायण अब भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed